फिर वो भूली सी याद आईं .......

फिर वो भूली सी याद आईं .......

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 09 Apr, 2021 07:41 pm प्रादेशिक समाचार लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा शिक्षा व करियर आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश,संजीव थापर(स्वतंत्र लेखक) 

अलविदा निर्वाचन विभाग , मैनें इस विभाग में कार्यरत रहते हुये बहुत कुछ सीखा । कार्य के प्रति समर्पण , दिये गये लक्ष्यों को सीमित समय में पूरा करना , विभिन्न विभागों के कर्मचारियों व अधिकारियों को निर्वाचन कार्य के प्रति जागरूक करके उनकी भागीदारी को सुनिश्चित करना , निर्वाचन से सम्बंधित विभिन्न कार्यों की मैनेजमेंट और हिंदी व अंग्रेज़ी भाषाओं में कुछ हद तक दक्षता हासिल करना , ये सभी कुछ मुझे निर्वाचन विभाग ने ही सिखाया । मुझे जिन अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ कार्य करने का सौभाग्य मिला वे स्वयंम ही अपने आप में परिपूर्ण थे और मेरे व्यक्तिगत विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है । 

दोस्तो यह सब लिखते लिखते ही एक गीत ज़हन में आ रहा है , " ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है " गीत के इन शब्दों का हम सभी के जीवन के साथ गहरा तालुक है । अब देखिये ना मेरे जीवन की शुरूआत भी इसी शहर धर्मशाला से शुरू हुई थी , बचपन में , सन शायद 1970 रहा होगा , मैं अपने घर जो कि डिपू बाज़ार धर्मशाला में था से घनियारा रोड़ में स्थित सरकारी प्राथमिक पाठशाला में पढ़ने जाता था , मुझे मेरी अध्यापिकाओं सरला मैडम और गायत्री मैडम और कृष्णा मैडम के चेहरे आज भी याद हैं , ग्रेजुएशन भी मैनें यहीं राजकीय कॉलेज धर्मशाला में प्राप्त की , आज भी अपने कॉलेज के कण कण से मुझे लगाव है , वर्ष 1991 में मैनें यहीं उपायुक्त कार्यालय में अपनी पहली नोकरी की शुरूआत की । 

एक नजर इधर भी-जिला चम्बा के विभिन्न मार्गों पर वाहनों एवं राहगीरों की आवाजाही के लिए लगा प्रतिबंधित ,उपायुक्त ने जारी किए आदेश

मुझे याद है वो दिन वर्ष 1991 का , उत्साह से लबालब जब मैं अपनी उपस्थिति उच्चाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा था , आंखों में एक आशा और सुनहरी भविष्य के विशाल सपनें थे और एक आज का  27 सितम्बर 2019 का दिन है , शहर भी मेरा वही अपना धर्मशाला है और मेरी नोकरी का अंतिम दिन , वही लोग हैं वही दोस्त हैं वही अधिकारी हैं और वही कर्मचारी हैं , वही ठहाके हैं वही मुस्कुराहटें हैं वही कानों में बातें हैं , वही कमरा है वही दीवारें हैं वही मेरे मेज व कुर्सी हैं । मैनें कनखियों से उनकी तरफ देखा है , वे भी सूनी आंखों से मेरी तरफ देख रहे हैं । 

तभी कहीं से रुँधी हुई आवाज़ आई है " क्या तुम कल नहीं आओगे , क्या अब कभी नहीं आओगे ? " शायद कमरे में मौजूद कुर्सी मेज दीवारें मुझसे सवाल कर रहे थे और शायद सूनी आंखों से शून्य में निहारते हुये मेरे वजूद ने कहा था " नहीं" शायद अब कभी नहीं । दोस्तो शायद यही ज़िन्दगी है , शायद इसी लिये कहा गया है " ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है " ।

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