भरमौर प्रशासन की अपरिपक्व व्यवस्था: फिर निराश हुए मणिमहेश झील में गंगाजल विसर्जित करने वाले श्रद्धालु, आखिर धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान ही क्यों सक्रिय होता है कोरोना ?

भरमौर प्रशासन की अपरिपक्व व्यवस्था: फिर निराश हुए मणिमहेश झील में गंगाजल विसर्जित करने वाले श्रद्धालु, आखिर धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान ही क्यों सक्रिय होता है कोरोना ?

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 29 Aug, 2021 11:46 am प्रादेशिक समाचार क्राईम/दुर्घटना सुनो सरकार धर्म-संस्कृति लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर चम्बा आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश,  मोनु राष्ट्रवादी(मुख्य संपादक)

अजीब दौर से गुजर रहा है देश जिसका नाम है करोना काल।  एक ऐसा काल जिसमें राजनीति से संबंधित कार्यक्रम हों तो आसानी से निपट जाते हैं लेकिन धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम हो तो कोरोना तुरंत हस्तक्षेप करता है।  भोग-विलास से संबंधित सुविधाएं हो तो मुहैया हो जाती हैं तब ठेके और बार खुल जाते हैं लेकिन धर्म की बात आई तो मंदिर खुलने से करोना फैलने का खतरा बन जाता है। समझ नहीं आता लेकिन पता नहीं क्यों हर बार कोरोनावायरस वहीं चोट करता है जहां मामले आम जनमानस से जुड़े हो लेकिन विशिष्ट लोगों से कोरोना पक्की यारी निभाता है। 

एक बार फिर से कोरोनावायरस के कुठाराघात के चलते मणिमहेश जाने वाले आस्थावान लोगों को कोरोना ने जगह-जगह नाके लगा कर रोक लिया है और यह कोरोना के नाके भरमौर से होते हुए मणिमहेश तक हैं।  इत्तेफाक तो देखो अगर श्रद्धालुओं को कुगती मंदिर जाना है तो कोरोनावायरस अपने नाके को तुरंत खोल देता है।  हालांकि यह बात अलग है कि लोग स्थानीय प्रशासन को उल्लू बना कर लोग कुगति से घूमते हुए भी मणिमहेश पहुंच रहे हैं।  इस बात की प्रमाणिकता उन लोगों द्वारा मणिमहेश जाने के बाद खींची गई फोटो को सोशल मीडिया पर अपलोड करने के बाद मिल जाती है। ऐसे में पूरी भरमौर प्रशासनिक व्यवस्था पर शक सा होने लगता है कि कहीं भरमौर प्रशासन शुतुरमुर्ग की जिंदगी तो नहीं जी रहा जिसको यह लगता है कि वह अपना सिर रेत में छुपा लेगा तो उसे कोई नहीं देख पाएगा क्योंकि जब उसे कोई दिखाई नहीं दे रहा तो उसे कोई नहीं देख सकता। 

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जिला चंबा के विशेषतः  गद्दी समुदाय से जुड़े लोगों की पुरखों पुरानी परंपरा रही है कि अपने किसी घर के व्यक्ति के मरणोपरांत जब उनकी अस्थि विसर्जन के लिए हरिद्वार ले जाया जाता है तो वहां से लाए गए गंगाजल को मणिमहेश की पवित्र डल झील में मिलाया जाता है लेकिन कोरोनावायरस की तथाकथित डर के कारण प्रशासन लोगों को उनकी धर्म परायणता निभाने से भी रोक रहा है , तो वहीं हिमाचल से बाहरी जैसे पंजाब आदि राज्यों से आने वाले हुल्लड़ बाज पर्यटकों को श्रद्धालु बनकर मणिमहेश जाने की खुली छूट मिल रही है, जहां प्रशासन का तर्क रहता है कि वे अपना कोविड-19 नेगेटिव सर्टिफिकेट दिखा रहे हैं। 

हालांकि गत वर्ष भी इसी तरह की अव्यवस्था का आलम भरमौर प्रशासन द्वारा देखने को मिला था जिसमें जम्मू से आने वाली पवित्र छड़ी यात्रा को भरमौर प्रशासन ने जाने से रोक दिया था लेकिन इस मामले को हिमाचल जनादेश उछालने के बाद भरमौर प्रशासन ने उन्हें मणिमहेश जाने की अनुमति दे दी थी।  ठीक उसी प्रकार इस वर्ष भी बाहरी हुल्लड़बाज मणिमहेश में जाकर सेल्फियां खींच रहे हैं लेकिन स्थानीय लोग जिनको हरिद्वार से लाए हुए गंगाजल को डल झील में विसर्जित करना है लटकाए हुए मुंह से वापिस भेज रहा है या फिर प्रशासन की आंखों में धूल झोंक कर वे लोग होली और कुगति के रास्ते से सिर्फ अपनी आस्था को जिंदा रखने के लिए पहुंच रहे हैं।

सर्वविदित है कि कल जन्माष्टमी है ऐसे में जन्माष्टमी के पर्वी काल को शुभ लग्न में माना जाता है तो जाहिर है आज गंगाजल को विसर्जित करने वालों की संख्या थोड़ी अधिक जरूर है  शायद इसीलिए प्रशासन ने भी कोरोना के तथाकथित संक्रमण को रोकने के लिए तीन जगह नाके लगा दिए हैं ताकि लोग मणिमहेश न पहुंच पाएं।  हालांकि लिखित रूप में नहीं लेकिन उड़ती खबर है कि भरमौर प्रशासन द्वारा गंगाजल ले जा रहे लोगों के लिए बकायदा अनुमति का प्रावधान है लेकिन ये अनुमति कब मिलेगी, कहां मिलेगी, कौन देगा इसकी किसी को भी जानकारी लोगों को नहीं है। 

फोन करके भी प्रशासन से अगर बात करना चाहे तो जनाब व्यवस्था में इतने व्यस्त होते हैं कि उन्हें फोन तक उठाने को समय नहीं क्योंकि जनाब कोरोनावायरस को रोकने में मशगूल हैं।  पता नहीं क्यों लेकिन पिछले 2 वर्षों में यह सिद्ध सा हो गया है कि कोरोनावायरस सिर्फ वहीँ आघात करता है जहां विषय आम जनता से जुड़े हो।  अफसोस..............

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