जन्मदिन जन्मदिन विशेष:हॉकी के सुपरहीरो मेजर ध्यानचंद का 'दिल्लीवाला कनेक्शन', ये 5 कहानियां हैं जरा हटके 

जन्मदिन जन्मदिन विशेष:हॉकी के सुपरहीरो मेजर ध्यानचंद का 'दिल्लीवाला कनेक्शन', ये 5 कहानियां हैं जरा हटके 

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 29 Aug, 2021 09:14 am सुनो सरकार देश और दुनिया लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर खेल जगत

हिमाचल जनादेश, न्यूज़ डेस्क 
 

 

 

हॉकी  के ग्रेट शोमैन मेजर ध्यानचंद की जिंदगी एक खुली किताब है, जिससे हर कोई अच्छे से वाकिफ है। उस किताब का शायद ही कोई ऐसा पन्ना हो जिससे हम और आप वाकिफ न हो। दद्दा और हॉकी के जादूगर जैसे उपनामों से भला कौन नहीं परिचित है। कौन नहीं जानता दुनिया को दूसरे वर्ल्ड वॉर में झोंक देने वाले हिटलर को दिए ध्यानचंद के करारे जवाब के बारे में।

 

हर साल 29 अगस्त को देश दद्दा के जन्मदिन को नेशनल स्पोर्ट्स डे के तौर पर मनाता है और अब तो भारत सरकार ने उनके देश के सबसे बड़े खेल सम्मान का नाम बदलकर भी उनके नाम पर ही कर दिया है। बहुत जल्द ही हॉकी के जादूगर की पूरी कहानी फिल्मी पर्दें पर भी छाने वाली हैं लेकिन इन तमाम बातों को छोड़कर भी दद्दा के बारे में कुछ ऐसी बातें हैं जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। जैसे उनका दिल्ली वाला कनेक्शन।

दद्दा और उनका दिल्लीवाला कनेक्शन।

असली कहानी की शुरुआत ही यहीं से होती है। यहीं से ध्यानचंद के हॉकी के जादूगर बनने की दास्तान शुरू होती है। उम्र थी 16 की और साल था 1922, जब वो पहली बार सिपाही बनकर फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट में शामिल होने दिल्ली आए थे। इस रेजीमेंट के सूबेदार थे मेजर बाले तिवारी। अब इन्हें ध्यानचंद का गुरु समझ लीजिए या उनका पहला कोच। पर माना जाता है कि इन्होंने ही ध्यानचंद को हॉकी का ककहरा पढ़ाया यानी कि उसे खेलने का तरीका बताया था।

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बाले तिवारी से हॉकी खेलने का हर हुनर सीखने के बाद जल्दी ही ध्यानचंद का चयन दिल्ली के सलाना मिलिट्री टूर्नामेंट के लिए रेजीमेंटल टीम में हो गया। सीधे शब्दों में कहें तो ध्यानचंद ने दिल्ली में ही अपना पहला बड़ा मैच और टूर्नामेंट खेला और जैसा कि वो अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं- ‘यहीं से उनकी जगह टीम में बतौर सेंटर फॉरवर्ड पक्की हो गई।’

1936 ओलिंपिक के लिए टीम के कप्तान के चुने जाने की बैठक भी दिल्ली में ही हुई। हॉकी फेडरेशन की इस मीटिंग में ध्यानचंद के नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लगी।

ध्यानचंद के कप्तान चुने जाने के बाद उसी साल 16 जून को पूरी टीम दिल्ली में इकट्ठा हुई। इसी तारीख को ध्यानचंद की टीम का एक मैच दिल्ली हॉकी इलेवन की टीम से हुआ। ध्यानचंद ने दिल्ली की टीम को गंभीरता से नहीं लिया। नतीजा ये हुआ कि मोरी गेट मैदान पर खेले मैच में दिल्ली की टीम ने ओलिंपिक के लिए चुनी ध्यानचंद की टीम को 4-1 से रौंद दिया। इस हार के बाद ध्यानचंद की कप्तानी पर खतरा मंडराने लगा उनसे उनकी कप्तानी छिनने का डर हिलोरे भरने लगा। ऐसा तो नहीं हुआ पर ध्यानचंद को इस घटना ने गुस्से से भर दिया।

ध्यानचंद के गुस्से का असर फील्ड पर खेल में दिखा। उनकी टीम ने अगले 5 मुकाबले न सिर्फ जीते बल्कि उसमें 24 गोल दागे भी। ये भी शायद दिल्ली से मिले हार के बाद उपजे गुस्से का ही असर था कि भारत 1936 ओलिंपिक में सिर्फ एक गोल खाया। उसके खिलाफ फाइनल में जर्मनी ने इकलौता गोल किया। भारत ये फाइनल मुकाबला 8-1 से जीतते हुए ध्यानचंद की कमान में ओलिंपिक चैंपियन बना था।

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