चंबा में ही नहीं भटियात व कांगड़ा में भी मनाई जाती है मिंजर,पढ़ें क्या है रस्म

चंबा में ही नहीं भटियात व कांगड़ा में भी मनाई जाती है मिंजर,पढ़ें क्या है रस्म

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 01 Aug, 2021 09:26 am प्रादेशिक समाचार धर्म-संस्कृति लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर चम्बा काँगड़ा आधी दुनिया

 हिमाचल जनादेश, एमएम डैनियल(संपादक)

भटियात में निर्मित की जाती है चीड़ की पत्तियों एवं रेशम के धागों से मिंजर 


विश्व विख्यात हो चुके मिंजर मेला पर्व का इतिहास केवल चंबा नगरी से ही नहीं जुड़ा है बल्कि रियासतकाल में चंबा प्रवेश के प्रथम द्वार भटियात व कांगड़ा जिला के साथ भी यह परंपारिक पर्व जुड़ा हुआ है। यहां भी मिंजर पर्व को बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। लेकिन यहां फर्क सिर्फ इतना है कि चंबा नगर की भांति यहां सांस्कृतिक संध्या, खेलकूद व शोभायात्रा जैसी गतिविधियां आयोजित नहीं होती है। जबकि शेष सारी रस्म चंबा नगरी मिंजर की भांति निर्वाह की जाती है। 

गौर हो कि रियासतकाल में दसवीं शताब्दी के इतिहास के दर्ज पन्नों पर अगर नजर डाली जाए तो मिंजर पर्व का आगाज जिक्र तत्कालीन शासक साहिल वर्मन से जुड़ा हुआ है। जिसमें शासक वर्मन ने पड़ोसी रियासत कांगड़ा व जम्मू पर युद्ध में विजय हासिल की थी। जिसमें तत्काल चंबा रियासत में प्रवेश दौरान पहले रियासत के द्वार कांगड़ा के द्रमण क्षेत्र में स्थित रेहलू गांव व भटियात के टूंडी, समोट, सिहुंता व चुवाड़ी में मक्की फसलों को लहराता देख युद्ध विजय के प्रतीत रूप में शासक साहिल वर्मन ने जीत के कई कार्यक्रम आयोजित किये। वहीं चंबा रियासत नगरी में युद्ध जीत पर्व को पूर्ण रूप से तत्काल शासक वर्मन ने विकसित किया। जिसमें जनता के व्यापार लेन-देन के लिए जीत के पर्व को मेले का रूप दे दिया। वहीं मिर्जा परिवार के महरूम बुर्जग शफी बेग मिर्जा को बतौर उच्च अधिकारी महाराज रघुवीर या सालीग्रा प्रति चिन्ह सुरक्षित लाने के लिए सम्मान चंबा शासक द्वारा प्रदान किया गया। 

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सन् 1642 तत्कालीन शासक पृथ्वी सिंह द्वारा मिर्जा परिवार बुर्जग सदस्यों की तिले, जरी, गोटे की कारगिरी से तैयार नायाब मिंजर को राजकीय सामान देते हुए शुद्ध तिले युक्त मिंजर को भगवान लक्ष्मीनाथ सहित महाराज रघुवीर या सालीग्राम प्रतिचिन्ह को अर्पित करने के लिए हुकनामा सुनाया गया। जो रूतबा मिर्जा परिवार सदस्यों के लिए आज भी कायम है। मगर भटियात व कांगड़ा क्षेत्र में रियासतकाल में प्रजा द्वारा चीड़ की पत्तियों के उपरी भाग पर रेशम की डोर बांध कर मिंजर तैयार की गई। इस प्राचीन मिंजर कारीगिरी युक्त चीड़ पत्तियों की मिंजर बनाने की रिवाज आज भी भटियात व जिला कांगड़ा के कई भागों में देखने को मिलता है। 

भटियात क्षेत्र में भी मिंजर आगाज सावन के तीसरे रविवार को मिंजर बनाना आरंभ कर दिया जाता है। लेकिन यहां चंबा की भांति भटियात व कांगड़ा में मिंजर को बहने भाईयों को या फिर गणमान्य व्यक्तियोंं द्वारा मिंजर बांधने का रिवाज नहीं है। जब सावन के चौथे रविवार सांयकाल मिंजर विसर्जन की चंबा में अदा की जाती है। उसी समय भटियात व वर्तमान कांगड़ा के रेलू गांव में भी मिंजर विसर्जन की रस्म अदा होती है। 

कैसी है भटियात व कांगड़ा में मिंजर आगाज व विर्सजन की रस्म : 
भगवान विष्णु, शिव भगवान की सावन के तीसरे रविवार को पूजा से ही भटियात व कांगड़ा में भी मिंजर पर्व का आगाज होता है। भटियात में टूंडी, समोट, सिहुंता व चुवाड़ी में इन क्षेत्रों में होकर गुजरने वाली मुख्य खड्डों में व जिला कांगड़ा में के रेहलू गांव म रेहलू नामक खड्ड में मिंजर विर्सजन की रस्म विधिवत्त पूजा अर्चना के साथ निर्वाह की जाती है। जिससे यहां के स्थनीय निवासीमिंजर पर्व  को दसवीं शताब्दी के तत्कालीन शासक साहिल वर्मन से जुड़ा हुआ एवं तब से चली आ रही रस्म के साथ आंकते है। 

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