ग्रामीण राजनीति का अखाड़ा: नेताओं के उलूल जलूल दावे तोड़ रहे है राष्ट्रपिता के 'स्वशासन' के सपने को 

ग्रामीण राजनीति का अखाड़ा: नेताओं के उलूल जलूल दावे तोड़ रहे है राष्ट्रपिता के 'स्वशासन' के सपने को 

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 19 Jan, 2021 06:56 am प्रादेशिक समाचार राजनीतिक-हलचल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर आधी दुनिया

 

हिमाचल जनादेश, नरेश ठाकुर (राज्य ब्यूरो)
वैसे तो पंचायती राज अधिनियम दलों को स्थानीय चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं देता। इस कानून के बनने के दौरान हुई लंबी बहस के कारण यह संभव हुआ था। बहुत से लोगों की दलील थी कि राजनीतिक दलों के दखल से स्थानीय निकाय प्रभावित होंगे। माना जाता है कि इस दलील की मूल भावना सामुदायिक सौहार्द था जो राजनीतिक दखल से बिगड़ रहा है लेकिन स्थानीय निकायों में राजनीतिक दलों की दिलचस्पी के हाल के चलन शायद ही कहीं विरोध हो रहा हो। क्या यह लोकतंत्र की परतों में दबा सत्ता के विकेंद्रीकरण का मार्ग है? राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने जिस स्थानीय स्वशासन की कल्पना की थी वो आज केसरी और भगवा की राजनीती तक सिमित रह गया है। इससे न यहां के आपसी सौहार्द बिगड़ रहा है जबकि इन चुनावों में अपने लोगों को फायदा देने के लिए रोस्टर से लेकर मतदाता सूचियों में छेड़छाड़ के आरोप लगे है। यहां तक कि हरेक वार्ड से 10 फीसदी तक मतदाताओं के नाम ही गायब कर दिए। दूसरा बड़ा झोल यह है किदोनों ही दलों के नेता जब चुनाव परिणाम के अगले दिन 70 से 90 फीसदी तक जीत के दावे कर डालते है। सिर्फ और सिर्फ अगले चरणों के चुनाव को प्रभावित करने की ग्रामीण राजनीति के अखाड़े पर धक्काशाही से कब्जा करने का प्रयास है। 

 

से शुरू हुआ चुनावों में 'दखलबाजी' 
पंचायत चुनावों ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। राज्य के विधानसभा चुनावों की तरह ही पंचायत चुनाव ने भी राजनीति और मीडिया को लुभाया है। मोदी हमेशा भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को स्थानीय चुनाव जीतने पर बधाई देते रहे हैं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल पंचायत चुनाव में अपने संसाधनों को झौंकते रहे हैं। ऐसा तब है जब सांवैधानिक रूप से स्थानीय चुनाव दलगत बैनर तले नहीं लड़े जा सकते। राजनीतिक दल इन चुनावों में अपने उम्मीदवार नहीं उतार सकते, इसलिए वे सिर्फ समर्थन करते हैं।ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर स्थानीय निकाय चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर इतने अहम क्यों हो गए हैं? इसका बड़ा कारण यह है कि पंचायती राज तंत्र ग्रामीण स्तर पर मजबूत राजनीतिक मंच के रूप में परिपक्व हो गया है। चुनाव और स्थानीय विकास में पंचायतों की बढ़ती भूमिका ने क्षेत्रीय और राजनीतिक दलों को ऐसा मंच दे दिया है जिसकी अनदेखी संभव नहीं है। पंचायतें ऐसी जगह बन गई है जहां राष्ट्रीय नेता डेरा डाले रहते हैं और यहीं से राज्य के भविष्य की रूपरेखा बनती है।

अक्सर पंचायत नेता राज्य और राष्ट्रीय चुनावों के वक्त राजनीतिक दल के सिपाही के रूप में काम करते हैं। बीजेपी के पूर्व राष्ट्रिय अध्यक्ष और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह की बूथ प्रबंधन रणनीति भी पंचायतों के नेताओं के जरिए लागू की जाती है इसलिए राजनीतिक दलों के प्रभाव को स्थापित करने के लिए पंचायतें एक तरह का सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) बन गई हैं। 

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इसलिए है पंचायतों पर नियंत्रण की कवायद 
पंचायतों पर नियंत्रण के बिना सत्ताधारी दल विकास कार्यक्रमों का श्रेय लेने में पिछड़ जाता है। राजनीतिक रूप से पंचायतें ऐसे हालात पैदा कर देती हैं कि सत्ताधारी दल द्वारा इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। पंचायत स्तर पर भी यह भावना घर करने लगी है कि राज्य और केंद्र में एक ही दल की सरकार होने पर बेहतर विकास होता है। यह चलन भी देखा गया है कि राज्य में सत्ताधारी दल यह तर्क देते हैं कि विकास के लिए बेहतर समन्वय जरूरी है।
 

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