हिमाचल का कालापानी है यह जेल, जहां स्वंतत्रता सेनानियों से मिलने आये थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

हिमाचल का कालापानी है यह जेल, जहां स्वंतत्रता सेनानियों से मिलने आये थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 17 Nov, 2020 06:56 am प्रादेशिक समाचार देश और दुनिया सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर सोलन आधी दुनिया


हिमाचल जनादेश, सोलन (योगेश)
 

*अंधेरी कालकोठरियो को देखकर आज भी निकल जाती है लोगों की सिसकियां


हिमाचल की हसीन वादियों में आज भी एक ऐसी जेल स्थापित है जिसकी अंधेरी कोठरियां को देखकर लोगों की रूह कांप जाती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं सोलन के डगशाई में स्थित जेल की। सोलन के डगशाई में ब्रिटिश काल में अंग्रेजों द्वारा बनवाई गई यह जेल आज भी एक खौफनाक मंजर दर्शाती है।  ब्रिटिश काल में डगशाई जेल कैदियों के लिए कालापानी की सजा से कम नहीं थी।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश के कोने-कोने में आजादी के लिए लोगों में मुहिम जगाने के लिए यात्राएं की थी। इस दौरान हिमाचल में भी उन्होंने अलग-अलग वर्षों में कई बार यात्राएं की। कालका-शिमला रेलवे ट्रैक से वह कई बार शिमला भी गए। देश में जहां महात्मा गांधी ब्रिटिश राज को उखाडऩे के लिए आंदोलन चलाए थे और बागी आयरिश कैदियों पर हो रहे अत्याचारों से भी दुखी थे। बागी आयरिश कैदियों पर अत्याचार होने की वजह ही महात्मा गांधी को हिमाचल के डगशाई स्थित मिलिट्री जेल में खींच लाई थी। ब्रिटिशकाल में हिमाचल की डगशाई छावनी में बनी मिलिट्री जेल की अंधेरी कोठरियों को देखकर आज भी रूह कांप उठती है।

अंग्रेज इस जेल में बागी सैनिकों को रखते थे। गांधी ने इस जेल में दो दिन बिताए थे। हालांकि वो सजा के तौर पर नहीं, बल्कि जेल में बंद आयरिश कैदियों से मिलने आए थे। 1849 में बनी इस जेल को 1949 के बाद कैदियों को रखने के लिए बंद कर दिया गया था। जेल के साथ एक संग्रहालय कक्ष है, जहां जेल व डगशाई से जुड़ी स्मृतियां रखी गई हैं। हिमाचल के कालापानी से मशहूर इस जेल को अंग्रेजों के क्रूर अत्याचारों के लिए जाना जाता है। इस टी-नुमा जेल में 50 भयावह कोठरियां थी, जिसके निर्माण पर 72873 रुपये का खर्च उस समय आया था।


1920 में आए थे महात्मा गांधी

महात्मा गांधी अगस्त, 1920 में यहां आए थे और जेल में दो दिन बिताए थे। जेल में बागी आयरिश सैनिकों को रखा गया था। आयरिश सैनिकों की आकस्मिक गिरफ्तारी ने महात्मा गांधी को डगशाई आने के लिए प्रेरित किया, ताकि वे यहां आकर इसका आकलन कर सकें। गांधी के दौरे को लेकर अंग्रेजों ने उनके ठहरने की व्यवस्था छावनी क्षेत्र में की थी, लेकिन उन्होंने जेल में ही कैदियों संग ठहरने की मांग की थी। गांधी महान आयरिश नेता इयामन डे वेलेरा के दोस्त व प्रशंसक थे।

आयरिश सैनिकों की ब्रिटिशराज के विरूद्ध संघर्ष से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को भी अतिरिक्त प्रेरणा मिली है। ऐसा कहते हैं कि गांधी के डगशाई दौरे से तत्कालीन ब्रिटिश रक्षा सचिव खुश नहीं थे। भविष्य में कोई भारतीय ऐसा साहस न करे, इस कारण उन्होंने आयरिश विद्रोहियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी।

अंग्रेजों के जुल्मों की कहानी को बयान कर रहीं जेल की दीवारें
जेल में बनी कालकोठरियां आज भी भयावह हैं। यहां पर अंधकूप अंधेरा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता था कि अंग्रेजों के समय में इस जेल में किस कदर कैदियों को यातनाएं दी जाती थीं। यहां कैदियों को ऐसी-ऐसी यातनाएं दी जाती थीं, जिनके बारे में सुन कर ही रूह कांप जाती है। इस जेल की दीवारें आज भी अंग्रेजों के जुल्मों की कहानी को बयान कर रही हैं। यहां पर कैदियों को बहुत यातनाएं दी जाती थीं। दंड देने के नए तरीके अपनाए जाते थे। शारीरिक तनाव के अलावा कभी-कभी कैदियों को अनुशासनहीनता का अनुभव महसूस करवाने के लिए अमानवीय दंड भी दिया जाता था। जेल में कैदियों के माथे पर गर्म सलाखों से नंबर दागा जाता था।

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दोनों दरवाजों के बीच में खड़ा किया जाता था कैदी

बताया जाता है कि कैदी को कैद कक्ष के दोनों दरवाजों के बीच में खड़ा किया जाता था। दोनों दरवाजों पर ताला लगाने के पश्चात यह सुनिश्चित किया जाता था कि कैदी बिना आराम किए कई घंटे इन दोनों दरवाजों के बीच रहे। इस जेल में कैदियों का एक कार्ड भी बनता था। इस कार्ड में कैदी का पूरा ब्यौरा जिसमें उसका नाम, रंग, देश, अपराध, कारावास की अवधि और फैसले की तारीख लिखी जाती थी।


आज जेल को बनाया गया है संग्रहालय, हज़ारों लोग करते है रुख
आज भी जिस सेल में महात्मा गांधी ठहरे थे, वहां पर गांधी की एक तस्वीर, चरखा व एक गद्दा रखा गया है। आज भी हजारों की संख्या में लोग इस जेल को देखने के लिए आते हैं। देश के साथ ही एक संग्रहालय कक्ष बनाया गया है जिसमें जेल व डगशाई से जुड़ी स्मृतियां रखी गई है।अपने जेल म्यूजीयम की इस यात्रा में आप स्वतंत्रता से पहले वाले जमाने के इतिहास में चले जाएंगे, जहां आप करीब से जान सकते हैं कि उस जमाने में कैदियों को कितनी कठोर सजा और यातनाएं दी जाती थी। आपको यहां बता दें कि यहां पर कामागाटामारू के बागी सिख सैनिकों को भी रखा गया था और बाद में इन्हें फांसी दे दी गई थी। 

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गांधी सेल में चरखा व गांधी की तस्वीर

डगशाई दौरे के दौरान जिस एकांत कैद कक्ष के वीआइपी सेल में महात्मा गांधी ने रात बिताई थी, उसमें उनकी तस्वीर लगाई गई है। सेल में एक पुराना टेबल रखा गया है जिस पर चरखा भी रखा गया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस जेल में महात्मा गांधी आयरिश कैदियों को देखने आए थे। उस जेल का अंतिम कैदी उनका हत्यारा नाथूराम गोडसे था, जिसे शिमला कोर्ट में ट्रायल के दौरान प्रवेश द्वार के साथ बने छह नंबर सेल में रखा गया था।


कहां है डगशाई जेल
चंडीगढ़ से 40 किमी और सोलन जिले के कसौली से 11 किमी दूर कुमारहट्टी के पास यह जेल स्थित है। यहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग आते हैं। पहाड़ी पर बनी सेंट्रल जेल अंडेमान निकोबार की जेल की ही तरह है। यहां कई जाने-माने स्वतंत्रता सेनानियों को रखा गया था। यहां कैदियों के माथे पर गर्म सलाख से माथे पर दागा जाता था। इसे दाग-ए-शाही कहा जाता था। इसी वजह से इस स्थान को अब डगशाई कहा जाता है। इस जेल में उस समय बागी सिख सैनिकों को भी रखा गया था और बाद में इन्हें फांसी दे दी गई थी। डगशाई इलाके को 1847 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थापित किया था। अंग्रेजों ने पटियाला के राजा से इस क्षेत्र के पांच गांवों को मिलाकर डगशाई की स्थापना की थी।

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