उमदा साहित्यकार भी थे दीनदयाल उपाध्याय

उमदा साहित्यकार भी थे दीनदयाल उपाध्याय

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 25 Sep, 2020 08:11 am प्रादेशिक समाचार राजनीतिक-हलचल देश और दुनिया लाइफस्टाइल ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश ,प्रो.अरुण कुमार

 

सुप्रसिद्ध चिंतक, विचारक एवं एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल एक राजनेता के रूप में अधिक विख्यात हैं। स्वाभाविक है कि वे भारतीय जनसंघ के 1952 से 1968 तक महामंत्री और अध्यक्ष रहे और इस दौरान उन्होंने देश भर में संगठन का ढांचा खडा कर उसे कांग्रेस के बाद देश का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनाया।

परन्तु बहुत कम लोगों को मालूम है कि दीनदयाल जी अपने समय के एक उच्च कोटि साहित्यकार भी थे जिनकी काल  रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं।

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उनके लेखन के बारे में टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता डा. संपूर्णानन्द ने दीनदयाल जी पुस्तक ‘पाॅलिटिकलडायरी’ की प्रस्तावना में लिखा है कि दीनदयाल जी जो भी कुछ लिखते थे उसे स्थायी वैचारिक अधिष्ठान प्रदान करके लिखते थे। यही कारण है कि उनके द्वारा लिखी गयी सामग्री आज भी पूरी तरह प्रासंगिक लगती है।

दीनदयाल जी की सबसे पहली पुस्तक ‘सम्राटचन्द्रगुप्त’ 1946 में प्रकाशित हुई,जो उन्होंने एक ही बार में बैठकर 16 घंटे में पूरी कर ली थी। दूसरी पुस्तक ‘जगदगुरू श्री शंकराचार्य’ 1947 में प्रकाशित हुई जो युवाओं के लिए उपयोगी उपन्यास है। संघ संस्थापक डा. केशव राव बलिराम हेडगेवार के अधिकृत जीवन चरित्र कामराठी से हिन्दी में अनुवाद दीनदयाल ने ही किया था।

उनके द्वारा लिखी गयी अन्य प्रमुख पुस्तकें हैंः अखंड भारत क्यों (1952),हमारा कश्मीर (1953),जोडें कश्मीरः मुखर्जी-नेहरू और अब्दुल्ला का पत्र व्यवहार (1953), टैक्स या लूट (1954),बेकारी की समस्या और उसका हल (1954), दो योजनाएं: वायदे,

अनुपालन, आसार (1958),सिद्धांत और नीतियां (1964),एकात्ममानववाद(1965),विश्वासघात (1965),वचनभंगः ताशकंद घोषणा की शव परीक्षा (1966), अवमूल्यनः एक बड़ापतन (1966),पाॅलिटिकल डायरी (1968)और राष्ट्र जीवन की दिशा (1971)।

उन्नीस सौ पचास के दशक से दीन दयाल जी का निकट सान्निध्य प्राप्त करने वाले ‘पांचजन्य’ के पूर्व संपादक स्व. देवेन्द्र स्वरूप अग्रवाल दीन दयाल के लेखन एवं पत्रकारिता से उनके संबंधों का जिक्र करते हुए बताते थे कि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सह-प्रांत प्रचारक रहते हुए दीनदयाल द्वारा 1946 में ‘सम्राटचन्द्रगुप्त’ और 1947 में ‘जगद्गुरू श्री शंकराचार्य’ पुस्तकें लिखने के बाद उनके लेखन की धाक जम चुकी थी। उनके लेखन की उसी श्रंृखला में से विचार उत्पन्न हुआ कि एक मासिक पत्र प्रारंभ किया जाए। 

उसका एक कारण यह भी था कि उस समय राष्ट्रवादी विचार को मुख्यधारा की  पत्रकारिता में स्थान नहीं मिलता था। उसी चर्चा के परिणामस्वरूप अगस्त 1947 में ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक की शुरुआत हुई। हालांकि उससे पहले दिल्ली से अंग्रेजी साप्ताहिक ‘आर्गेनाइजर’ की शुरूआत हो चुकी थी। ‘राष्ट्रधर्म’ प्रारंभ करने के बाद सभी के मन में ख्याल आया कि एक माह का समय बहुत अधिक होता है, इसलिए कम से कम एक साप्ताहिक पत्र भी होना चाहिए। उसी चर्चा के बाद 1948 में मकर संक्रांति के दिन ‘पांचजन्य’ की शुरूआत हुई। 

औपचारिक रूप से ‘राष्ट्रधर्म’ के संपादक अटल बिहारी वाजपेयी और राजीव लोचन अग्निहोत्री थे और ‘पांचजन्य’ के संपादक अटल थे। दोनों ही दीनदयाल को अपना गुरू मानते थे। बाद में दीनदयाल की प्रेरणा से एक हिन्दी दैनिक ‘स्वदेश’ का भी प्रकाशन प्रारंभ हुआ। गांधी हत्या के झूठे आरोप में जब संघ पर प्रतिबंध लगा तो उस दौरान दीनदयाल ने ’हिमालय’ और ‘राष्ट्रभक्त’ नाम से दो अन्य प्रकाशन भी प्रारंभ किये, परन्तु वे अधिक समय तक नहीं चल सके।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रान्त प्रचारक होते हुए दीनदयाल को प्रवास करना पड़ता था। प्रवास के दौरान भी वे अध्ययन करते थे। वे कहीं भी जाते तो उनके झोले में दो-चार पुस्तकें अवश्य रहती थीं। अपनी बौद्धिक अभिरुचि के अनुसार उन्हें ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘पांचजन्य’ बहुत प्रिय थे। इसलिए जैसे ही ये पत्र छपें सभी जगह समय से पहंुच जाएं इसकी भी वे सदैव चिंता किया करते थे।

 वह आर्थिक अभावों का दौर था और साधन बहुत सीमित थे। इसलिए जरूरत के हिसाब से दीन दयाल लिखने से लेकर कंपोजिंग और मशीन चलाने तक में जुट जाते थे। यही नहीं, वे अखबार के बंडल हाथ में लेकर वितरण करने के लिए भीजाया करते थे। उनके लिए पत्रकारिता व्यवसाय नहीं, मिशन थी। पद या प्रतिष्ठा का उनके लिए कोई महत्व नहीं था।

(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय में दीनदयाल उपाध्याय पीठ के अध्यक्ष हैं)

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