धीरे-धीरे बिलुप्त हो रही सायर का त्यौहार ,16 सितंबर को मनाया जाता है जिसे हिमाचल में कहते है सगरांद

धीरे-धीरे बिलुप्त हो रही सायर का त्यौहार ,16 सितंबर को मनाया जाता है जिसे हिमाचल में कहते है सगरांद

Piyush 15 Sep, 2020 08:35 pm प्रादेशिक समाचार धर्म-संस्कृति लाइफस्टाइल ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा मनोरंजन स्वस्थ जीवन आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश,धर्मशाला (करतार चंद गुलेरिया) 


पहले  बरसात के दिनों में पीने के लिए स्वच्छ पानी ना मिलने के कारण संक्रामक बीमारियां फैल जाया करती थीं जिससे इंसानों और पशुओं को भी भारी नुकसान होता था।इसके इलावा सांप के काटने पानी में डूबने भूस्खलन के कारण बहुत लोगों की मौत हो जाती थी, लोग सकुशल बचने की खुशी में भी यह त्यौहार मानते थे।

काले महीने के नाम से पहचाने जाने वाले भाद्रपद महीने में मायके गईं नई दुल्हनें भी सैर को ही अपने ससुराल लौटती हैं।क्योंकि काले महीने में सास और बहू का एक साथ रहना अच्छा नही माना जाता है इसलिये नई दुल्हन काले महीने में मायके चली जाती है। 

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सायर को कैसे पूजते है 
सायर से एक दिन पहले ही पूजा की सामग्री इकट्ठा करने पड़ती है इस सामग्री में मक्की,गुलबंश के फूल,खट्टा, ककड़ी,अखरोट,अमरूद,कद्दू का फूल तली हुई रोटी धान का पौधा आदि एकत्रित किया जाता है।सुबह 4- 5 बजे यह सामग्री थाली या टोकरी में डालकर उसमें दीया जलाया जाता है,घर के सभी सदस्य इकठ्ठा होकर माथा टेकते है और जो हाथों में बँधी राखी को खोलकर सायर की थाली में डाल दिया जाता है,पूजा ख़त्म होने के बाद सायर को चलते हुए पानी में बहा दिया जाता है।

दिन में घरों में खूब पकबान बनते है और एक दूसरे को खाने में आमन्त्रित किया जाता है।चौपालों में अखरोट खेले जाते है काँचो की तरह अखरोटों पर भी निशाना लगाया जाता है।बदलते समय के साथ त्यौहारों का महत्व भी घटता जा रहा है गांवों में तो यह प्रथा अब भी जिंदा है पर शहरों में धीरे 2 बिलुप्त होती जा रही हैं।

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