पालकी - जिसकी सवारी नई दुल्हन से लेकर महाराजाओं तक ने की

पालकी - जिसकी सवारी नई दुल्हन से लेकर महाराजाओं तक ने की

Piyush 14 Sep, 2020 09:54 pm प्रादेशिक समाचार धर्म-संस्कृति सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा मनोरंजन आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश, धर्मशाला  (करतार चंद गुलेरिया)  

सदियों से ही भारत वर्ष में पालकी या डोली का प्रयोग हो रहा है ! उस समय राजा महाराजाऔर कुछ चुनिंदा राजबाड़े और अंग्रेज अधिकारी ही पालकी का इस्तेमाल कर सकते थे । छोटी जाति के लोंगो को पालकी पर सबारी का अधिकार नही था! उस समय भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं सामाजिक चेतना के अग्रदूत श्री जयानंद भारती ने डोला-पालकी आन्दोलन चलाया। यह वह आन्दोलन था जिसमें शिल्पकारों के दूल्हे-दुल्हनों को डोला-पालकी में बैठने के अधिकार बहाल कराना था।

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लगभग 20 वर्षों तक चलने वाले इस आन्दोलन के समाधान के लिए भारती जी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया जिसका निर्णय शिल्पकारों के पक्ष में हुआ । पालकी का उपयोग लंबी दूरी के सफर में होता था , बाद में जगह बदल कर पालकी ब्याह शादियों के खास मौकों में शामिल हो गयी ,और एक समय तो दूल्हा दुल्हन की ब्याह शादी पालकी के बिना अधूरी सी समझी जाती थी ! मतलब उसमें बिना पालकी के उस समय तक कोई रौनक नही होती थी ।

पालकी शुभ मंगलाचार की प्रतीक मानी जाती है ! डोली व पालकी अब धीरे-धीरे ओझल होने लगी ,वक्त के थपेड़ों के साथ यह प्रथा भी धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है. आजकल डोली या पालकी के दर्शन दुर्लभ हो गये हैं। अब पालकी का इस्तेमाल दूर दराज के इलाकों में ही होता है जहाँ सड़क की सुविधा नही है ।

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