भारत में बढ़ते कोविड के मामले और डिजिटल पढाई चलन, तकीनीकी क्रांति या है मजबूरी

भारत में बढ़ते कोविड के मामले और डिजिटल पढाई चलन, तकीनीकी क्रांति या है मजबूरी

Piyush 12 Aug, 2020 01:05 pm सुनो सरकार देश और दुनिया विज्ञान व प्रौद्योगिकी लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर शिक्षा व करियर

हिमाचल जनादेश, पुष्पांकर पीयूष 

बीते साल कोविड ने चीन में दस्तक देते हीं पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया था। पूरा विश्व न तो कभी इतने बड़े स्तर की महामारी को बीते सौ सालों में झेला था न ही उसके लिए तैयार था। कोविड महामारी ने पुरे विश्व को मानो स्थिर कर दिया हो, ऐसा की किसी ने घूमते पहिये में जंजीर लगा कर उसे बाँध दिया हो।साल की शुरुवात होते होते इस महामारी ने अपना पाँव पसारना शुरू किया। चीन से होते हुए पहले इरान , फिर इटली फिर यूरोप को अपने मकर जाल में ऐसा बाँधा की लाशों की ढेर लगते देर नहीं लगी। आज इससे कोई भी देश अछूता नही है। किसी ने इस पर काबू पा लिया तो कुछ देश इसे रोकने के लिए जद्दोजहत में लगे हुए हैं।
 

थम गया आर्थिकी का पहिया 

 लेकिन इस महामरी के दरमियान जब सब देश ने इसके रोकथाम के लिए प्रयास शुरू किया तो उन्होंने अपने आखिरी विकल्प को चुनते हुए लॉक डाउन घोषित कर दिया। इससे न सिर्फ उन देशों की आर्थिक गतिविधियों को विराम लग गया बल्कि मानव अस्तित्व के बड़े होने उनमे चेतना लाने से जुड़े, उन्हें समझदार व काबिल बनाने वाले संस्था स्कूल और कॉलेज के गेट पर मोटे तालों से बाँध कर करोड़ों बच्चों को स्कूल और कॉलेज जाने से वंचित कर दिया। 

यूनेस्को ने का 22 करोड़ छात्र हुए प्रभावित 
यूनेस्को की रिपोर्ट को माने तो एक अनुमान के मुताबिक 22 देशों के 290 मिलियन से अधिक छात्रों पर कोरोनोवायरस महामारी का प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यूनेस्को का अनुमान है कि भारत में लगभग 32 करोड़ छात्र प्रभावित हैं, जिनमें स्कूल और कॉलेज शामिल हैं।

वहीं यूनेस्को ने सभी देश के सरकारों व स्टेक होल्डर को स्कूल बंद होने के तात्कालिक प्रभाव को कम करने के लिए, व पढाई को जारी रखने के लिए अपनी गाइड लाइन जारी करते हुए कहा है की  विशेष रूप से अधिक कमजोर और वंचित समुदायों के लिए, और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से सभी के लिए शिक्षा की निरंतरता को सुविधाजनक बनाने के अपने प्रयासों में देशों का समर्थन कर रहा है।

डिजिटल पढाई ने दी दस्तक 
इसलिए विभिन्न देशों की सरकार ने पढाई जारी रहे ईसके लिए डिजिटल के माध्यम से स्कूल व कॉलेज में पढाई करवाने की कार्य योजना बना रही है। इसीलिए भारत सरकार ने एक ई लर्निंग कार्यक्रम बनाया है। जिसके मदद से छात्र/ छात्राएं अपनी पढाई में बिना किसी रुकावट को आगे बढ़ा सकें। 
दूरस्थ शिक्षा इस समय के दौरान छात्रों के लिए एक वरदान साबित हो रही है, क्यूंकि यह काफि सुविधा जनक होने के साथ साथ आपको समय बाध्यता की सीमा से आको बहार लाता है,  क्योंकि वे सुविधाजनक, ऑन-गो और पाठ के लिए सस्ती पहुँच प्रदान करते हैं। ई-लर्निंग आज पुराणी शिक्षा पद्धति (कक्षा शिक्षण) की तुलना में एक दिलचस्प और इंटरैक्टिव विकल्प के रूप में आता है।

लेकिन इसकी भी कुछ तय है समय सीमा 
लेकिन हर वरदान की एक सीमा होता है, उसे भी कही न कही किसी न किसी का प्रकार से रुकावट का सामना तो करना ही पड़ता है। यही हाल कोविद के समय में उपजे इस डिजिटल पढाई के साथ। शिक्षाविदों की माने तो महामरी के बावजूद सिक्षा के इस वैकल्पिक मार्ग को छोड़ अपने पुराने रास्ते पर आना ही होगा। विशेषज्ञों ने अपनी राय देते हुए कहा की कक्षा के फिर से शुरू होने तक छात्रों को किसी भी संक्रमण की संभावना को कम करते हुए कक्षा शिक्षा के लिए शून्य से तीन साल की अवधि के लिए शून्य में भरने के लिए डिजिटल शिक्षा एक व्यवहार्य समाधान प्रतीत होता है।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने भारत में डिजिटल शिक्षा के केंद्रबिंदु परिधीय मुद्दे को भी केंद्र में लाया है। आगे बढ़ते हुए, डिजिटल शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत करने की संभावना है। यह भारत में विविध भौगोलिक क्षेत्रों में सीखने की सुविधा प्रदान करके समावेशी शिक्षा प्रदान करेगा। इसके अलावा, यह शिक्षकों को हर छात्र के लिए अनुकूलित शिक्षण समाधान के साथ आने का अवसर प्रदान करेगा।
हालंकि डिजिटल लर्निंग के अपने कई फायदे हैं इससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता। जैसे कि डिजिटल लर्निंग की कोई भौतिक सीमा नहीं होती है, इसमें पारंपरिक शिक्षण के बजाय सीखने का जुड़ाव अनुभव अधिक होता है, यह खर्चीला भी होता है और छात्रों को अपने कम्फर्ट जोन के दायरे में सीखने को मिलता है।

हालांकि, डिजिटल लर्निंग अपनी सीमाओं और चुनौतियों के बिना नहीं है, क्योंकि आम तौर पर आमने-सामने की बातचीत को आम तौर पर संचार का सबसे अच्छा रूप माना जाता है, बजाय दूरस्थ शिक्षा के अव्यवस्थित प्रकृति की तुलना में। विश्व स्तर पर, ऑनलाइन शिक्षा कुछ सफलता के साथ मिली है।

भारत में अभी पूर्ण डिजिटल शिक्षा मुश्किल 

लेकिन जब हम बात भारत विकासशील और भुत बड़े विविधता से भरे देश की बात करते हैं तो, हमें अभी डिजिटल लर्निंग के क्षेत्र में एक लम्बा फासला तय करना बाकी है क्यूंकि यह बात तो दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों के लिए एक आम बात साबित हो सकता है। ले३किन जब भारत जिसे कंट्री ऑफ़ विलेज कहा गया है। उसके आधे गावो में अभी बेहतर कोन्नेक्टिविती नहीं पहुंची की बिना सिग्नल की समस्या पैदा हुए अच्छे से बात किया जा सके , दूरस्थ सिक्षा तो अभी दूर की कौड़ी ही साबित हो रही है। 

सरकारी आंकड़े करती है हकिकत बयाँ

सरकारी आंकड़े ही उठा कर देख लें तो वर्तमान में भारत सरकार द्वारा डिजिटल शिक्षा के बुनियादी ढांचे का निर्माण बजट की कमी के कारण कठिन प्रतीत होता है। इसके अलावा, भले ही डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया गया हो, छात्रों को प्रामाणिक और उचित, निर्बाध और निर्बाध शिक्षा प्रदान करने के लिए डिजिटल प्रणाली का उपयोग करने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण देना पड़ता है। दूरस्थ शिक्षा तेजी से विश्वसनीय बिजली आपूर्ति और सर्वव्यापी इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भर करती है जो भारत में टियर 2 और टियर 3 शहरों के लिए एक दूर की बात हो सकती है।
एक और चुनौती यह भी है की , ई लेर्निंग कोविड की समस्या से उपजे उस खालीपण को भरने के तौर पर इस्तेमाल में लाया जा रहा है, जिसके नवीनतम होने के कारण पढने और पढ़ाने वालों को रोज तकनिकी समस्या से दो चार होना पड़ता है। 
शिक्षा की सफल डिलीवरी भी सवालों के घेरे में है क्योंकि उच्च शिक्षा के स्तर पर सीखना और किंडरगार्टन / स्कूल स्तर पर सीखना अलग हो सकता है। डिजिटल शिक्षा को शिक्षा के हर स्तर पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।

यदि हम शैक्षिक सामग्री पर प्रकाश डालते हैं, तो लिखित और आसान सामग्री की तुलना में डिजिटल शिक्षा में एक सीमित गुंजाइश होगी जो एक शैक्षिक संस्थान में प्रदान की जाती है। ई-लर्निंग हमेशा छात्रों को विभिन्न तरीकों से अलग-अलग जानकारी प्रदान करेगा। इसलिए, इन सामग्रियों को छात्रों के साथ प्रसारित करने से पहले शैक्षिक सामग्री की प्रामाणिकता का परीक्षण किया जाना चाहिए। सामग्री का निर्माण, सामग्री का प्रसार और सामग्री का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। 

ज़ूम एप का बड़ा उपयोग 

महामारी के प्रकोप के कारण, भारत में घर (WFH) संस्कृति से काम फलफूल रहा है। चूंकि COVID 19 के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए सोशल दिस्तेंसिंग को सबसे अच्छा तरीका बताया गया है, 
इसलिए, भारत में न केवल व्यवसायियों या स्टार्ट-अप्स ने अपने कर्मचारियों के साथ जुड़े रहने के लिए ज़ूम ऐप जैसे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का विकल्प चुना है, जो अपने घरों से काम कर रहे हैं, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों ने अपने छात्रों के लिए सीखने की सुविधा के लिए विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों का विकल्प चुना है। 

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हालांकि, शहरी क्षेत्रों में केवल शैक्षणिक संस्थान ही उन सुविधाओं को प्रदान कर सकते हैं। फिर से ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षार्थियों, ग्रामीण क्षेत्रों में शैक्षिक प्रणालियों और उनकी वृद्धि पर सवाल उठाए जाते हैं।

 

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