विकास या विनाश:एक अदृश्य विषाणु के आगे कितनी असहाय हो चुकी हैं विश्व की महान शक्तियां

विकास या विनाश:एक अदृश्य विषाणु के आगे कितनी असहाय हो चुकी हैं विश्व की महान शक्तियां

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 12 Apr, 2020 09:28 pm प्रादेशिक समाचार क्राईम/दुर्घटना देश और दुनिया लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर चम्बा स्वस्थ जीवन आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश

वर्तमान परिस्थितियां निस्संदेह विकट हैं।  हालात प्रतिदिन बदतर होते जा रहे हैं. मानव जाति लाचार है।  स्थिति जटिल से जटिल होती जा रही है. मानवता बेवस  है. आखिर सह सब है क्या?.. ये हालात पैदा ही कैसे हुए?

वर्तमान परिस्थितियों का अगर गहनता से मंथन किया जाए तो ऐसा अहसास होता है जैसे प्रकृति ने स्वयं अपना संतुलन स्थापित करने का प्रयास आरंभ कर दिया हो।  क्यों कि प्रकृति एक ऐसी सर्वोच्च शक्ति है जो अपना संतुलन स्थापित करने में स्वयं सक्षम है इस में कोई दो राय नहीं है। 

आश्चर्य की बात तो यह है कि विकास की चरम सीमा तक पहुँचने का दंभ रखने वाली विश्व की महान शक्तियां भी एक अदृश्य विषाणु के आगे कितनी असहाय व नतमस्तक हो गई है कि इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।  मानवता के विनाश के लिए विभिन्न प्रकार के परमाणु हथियारों का असीम भंडार संग्रहित करने वाली विश्व की महान शक्ति सम्पन राष्ट्र कभी इतने असहाय व निर्बल हो सकते हैं यह निस्संदेह कल्पना से परे है। 

 
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पूरे विश्व में लाखों की संख्या में होने वाली असमय मौतें कहीं न कहीं यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि इस विनाश के लिए मनुष्य ही उतरदायी है जो शायद विकास और विनाश के भेद को जान नहीं पाया है।

विकास का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ दिन जीवन को सुरक्षित रखने के लिए अपने आप को घरों में ऱखने के कारण इतनी छटपटाहट परिलक्षित हो रही है कि यह सोचना सहज हो जाता है कि क्या हमने इतना भी नहीं संजोया है कि कुछ दिन विकट परिस्थितियों का सामना अपने सामर्थ्य से कर सकें। 

 तो यह सारी भाग दौड़ किस लिए ,कैसा विकास और किसलिए? प्रतीत तो यही होता है कि विवेक शक्ति का ह्रास ही सबसे बड़ा कारण है।  प्रकृति अपने साथ होने वाले अन्याय की भरपाई करने में स्वयं सामर्थ्य वान है और जब यह एेसा करती है तो मानव को अपने अस्तित्व का अहसास होता है कि वह कितना तुच्छ और नगण्य है।

 वर्तमान हालात केवल मात्र चुनौती ही नही बल्कि एक गंभीर चेतावनी है जो शायद कुदरत ने मानव को उस के कृत्यों के परिणाम स्वरूप दी है.. पूरे विश्व में असमय अपने प्राण गंवाने वाले लोगों के प्रति एक गहरे दुख का अहसास होता है और हमें यह सोचने को भी मजबूर करती है कि कैसे हम इस गंभीर चुनौती से भविष्य के लिए सबक लें। 

 समस्या निस्संदेह बाहर है परंतु इसका समाधान निस्संदेह हमारे भीतर है।  वक्त दृढता से आत्मविश्लेषण व मूल्यांकन करने का है।  तदुपरांत सुनहरे भविष्य की ओर दृढ संकल्प से अग्रसर होने की।  अन्यथा हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए कैसी विरासत छोड़ जाएंगे।  इसका अनुमान सहजता से ही लगाया जा सकता है....

विक्रमजीत वर्मा, प्रवक्ता (एंग्लो भाषा),जिला चम्बा

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