उत्तर भारत की संस्कृति का अनूठा अंग लोहड़ी महापर्व

उत्तर भारत की संस्कृति का अनूठा अंग लोहड़ी महापर्व

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 13 Jan, 2020 12:59 pm प्रादेशिक समाचार धर्म-संस्कृति लाइफस्टाइल सम्पादकीय स्लाइडर कुल्लू आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश,आनी(राज शर्मा) 

भारत वर्ष में प्रत्येक दिन या प्रत्येक महीने में कोई न कोई धार्मिक व पुरातन सांस्कृतिक पर्व मनाया जाता है । इन पर्वों का निर्वहन आज से नही अपितु सदियों से चला आ रहा है।हमारे सभी पर्व व पुरातन संस्कृति आपस में सभी धर्मों को जोड़े हुए हैं।पर्व व संस्कृति का अस्तित्व न रहने से मानव जीवन में नीरसता आ जाएगी।

उत्तर भारत का सूर्य के उत्तरायण में आने के एक दिन पूर्व लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है।लोहड़ी के अवसर पर सभी को शुभमंगलकामनाओं के साथ मूंगफलियां, रेवड़ियां , गुड़ और गजक बांटते हैं और हर्षोल्लास के साथ लोहड़ी का पर्व मनाते हैं।

संध्या की स्याह कालिमा के साथ ढोल की थाप पर लोकगीत गाए जाते हैं । लोहड़ी के इस पावन पर्व के साथ इस कथा को जोड़ा गया गया है। जिसमे एक ब्राह्मण परिवार में दो बेटियां सुंदरी-मुंदरी को कुकर्मियों से मुक्त करवाकर उनका विवाह किया । इसी रीति को बनाए हुए सदियों से ये लोकगीत गाया जाता है ।

सुन्दिरिये-मुन्दिरिये-हो तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला मही वाला-हो दुल्ले ने घी ब्याही-हों
सेर शक्कर पाई-हो कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा सालू फाटा-हो सालू कौन समेटे-हों
चाचा चूरी कुट्टी-हों जमीदारा लूटी-हो
जमींदार सुधाये-हो बड़े भोले आये-हों
इक भोला रह गया-हों सिपाही पकड़ के लै गया-हों
सिपाही ने मारी ईट, भाँवे रो, ते भाँवे पीट
सानू दे दे, लोहड़ी तेरी जीवे, जोड़ी

असी गंगा चल्ले – शावा
सस सौरा चल्ले – शावा
जेठ जेठाणी चल्ले – शावा
देयोर दराणी चल्ले – शावा
पियारी शौक़ण चल्ली – शावा
असी गंगा न्हाते – शावा
सस सौरा न्हाते – शावा
जेठ जठाणी न्हाते – शावा
देयोर दराणी न्हाते – शावा
पियारी शौक़ण न्हाती – शावा
शौक़ण पैली पौड़ी – शावा
शौक़ण दूजी पौड़ी – शावा
शौक़ण तीजी पौड़ी – शावा
मैं ते धिक्का दित्ता – शावा
शौक़ण विच्चे रूड़ गई – शावा
सस सौरा रोण – शावा
जेठ जठाणी रोण – शावा
देयोर दराणी रोण – शावा
पियारा ओ वी रोवे – शावा
कंडा कंडा नी लकडियो कंडा सी
इस कंडे दे नाल कलीरा सी
जुग जीवे नी भाबो तेरा वीरा सी,
पा माई पा, काले कुत्ते नू वी पा
कला कुत्ता दवे वदायइयाँ,
तेरियां जीवन मझियाँ गईयाँ,
मझियाँ गईयाँ दित्ता दुध,
तेरे जीवन सके पुत्त,
सक्के पुत्तां दी वदाई ।

लोहड़ी का पर्व पंजाब,हरियाणा, दिल्ली,हिमाचल, एवं कश्मीर में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

● दक्ष प्रजापति ने कनखल में जो सार्वभौम यज्ञ करवाया जिसमे सबको निमंत्रण दिया गया परन्तु भूतभावन भगवान शिव को उस यज्ञ में नही बुलाया गया।आदिशक्ति सती ने जब यह अपमान जानकर उसी यज्ञ में अपना शरीर समर्पित कर दिया था । दक्ष के इसी प्रायश्चित हेतु आज भी कई स्थानों पर बेटियों को इस दिन उपहार देने की परम्परा है । लोहड़ी के अवसर पर लकड़ियों व गोबर के उपलों  की ढेरी बनाकर जलाया जाता है और उसके चारों ओर लोकगीत गाकर नृत्य किया जाता है ।

● एक अन्य अवधारणा 

पंजाब में दुल्ला भट्टी एक क्रूर मुगल शासक रहता था । लोग उसे पंजाब का नायक मानते थे क्योंकि वह अमीरों से बहुमूल्य धन लूट कर गरीबों में बांटा करता था। इसके अलावा उस समय लड़कियों को गुलाम के रूप में बलपूर्वक अमीरों को बेचा जाता था। दुल्ला भट्टी ने एक प्लान बनाकर लड़कियों को न ही सिर्फ गुलाम होने से बचाया बल्कि उनकी शादी की सारी व्यवस्थाएं भी करवाई। हर वर्ष बड़े हर्षोल्लास से लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है ।
 

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