आओ दिवाली मनाएं

आओ दिवाली मनाएं

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 26 Oct, 2019 02:07 pm प्रादेशिक समाचार धर्म-संस्कृति सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर कुल्लू आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश ,राजेन्द्र पालमपुरी

आओ दिवाली मनाएं - सुबह सुबह ही हम सब चहक उठते थे आज के दिन वैसे तो दीपावलि आने से महीना भर पहले से ही घर की साफ सफाई का काम शुरु हो जाया करता था।लेकिन फिर भी आज का दिन तो हम सबके लिये बहुत खास रहता ही था।नए या फिर पुराने लेकिन साफ सुथरे कपड़े पहन और सज धज कर अपने संगी साथी मित्रों के साथ कभी इस घर तो कभी उस घर हम घूमते घुमाते घरों की अच्छी तरह निगरानी करते किस घर में क्या हो रहा है।  कौन कितनी सजाबट कर रहा है ,गेंदे के फूल की सुंदर मालाएँ और हार किसने ज्यादा तो किसने कम लगाए हैं। सभी के घर देखने में व्यस्त दिखते हम आज की तरह बना बनाया रैडीमेड सामान नहीं बिका करता था। बाजारों या मैगा मार्ट में हमारे जमाने में हम सब मिल जुलकर रंग बिरंगे फूल चुनने के लिये अपने आस पड़ोस के बाग बगीचों और पड़ोसी घरों की तांक झांक करके फूल ले आते। उन्हीं के हार बगैरह बना कर अपने खिड़की दरवाजों में लगा लेते।गेंदे के फूलों की तेज सुगंध हवा के रुख के साथ ही बिखरी रहती आस पास हमारे घरों के अंदर बाहर चीनी से बनी रंग बिरंगी मिठाई हम खूब खाते।खील बताशों से भरी पीतल की बड़ी परात से सबको प्रशाद देने की परंपरा भी रही है।यही खील बताशे पूजा के काम में भी लाए जाते।

10/15 दिन पहले ही खेतों से लाई गई मिट्टी को घर के आंगन में ही पराळी या चीड़ के नुकीले पत्तों को छोटा छोटा करके उसे गीला होने के लिये रख दिया जाता था और बाद में उसी मिट्टी से पुताई की जाती थी। गेरू से लिपे पुते घर सुंदर दिखने के साथ साथ ही स्वच्छ और सुगंधित रहते कई कई दिनों तक अपनी देसी मिट्टी यानि गेरू की भीनी भीनी सुगंध के साथ भीगे और पीसे हुए चावल की रंगोली हम सबको अपनी ओर आकर्षित करती।मैं अक्सर सोचा करता - कितनी बड़ी बड़ी  कलाकार हैं हमारी छोटी बड़ी सभी लड़कियां जो अपनी उंगलियों से भिन्न भिन्न प्रकार की दिल को छूने वाली रंगोलियां बनाकर घरों की साज सज्जा में चार चांद लगा देतीं। हैरानी तो और भी बढ़ जाती जब हमारे घरों की बहु बेटियां अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार मिट्टी से बनी छोटी छोटी दयूठळियों  में सरसों के तेल या फिर देसी घी के टिम टिम करते दीये जलातीं।

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शहरों की दिवाली हमेशा गांव की दीपावलि से भिन्न रही ही है कोई माने या न माने लेकिन ऐसा तो मैं बचपन से ही मानता हूं और शायद आईंदा भी मानता ही रहूंगा।क्योंकि जितना वनावटीपन शहरों में पहले था ठीक वैसी ही झलक अब तलक भी देखने को मिल ही जाती है। हमारे शहरों में उपहार स्वरूप मिठाई लेने देने से लेकर भेंट के मामलों में भी कुछ अलग सा होता ही है। गांव और शहरों के परिवेश में गांव में हम सब एक दूसरे को मिठाईयां बांटकर ही दीवाली की मुबारकें और बधाईयाँ देते रहे हैं। जबकि शहरों में यह सब बनावटी ढकोसला मात्र बनकर  गया है अच्छे से याद है हम पटाखे भी मिल बांट कर जला लिया करते थे।घरों में रंगोली और चौके बनाकर उनपर तेल भरे दीये जलाए जाने के साथ ही पूजा अर्चनाएं करते देख हम सब अनायास ही बल्कि इन सबसे अनजान होते हुए भी अपने बड़े बुजुर्गों के साथ अपने ईष्टदेव का भी स्मरण कर लिया करते थे।जो आज कहीं कहीं ही देखने को मिलता है। 

मां लक्ष्मी का पूजन या अनुष्ठान हमारे हिंदु समाज का आज विशेष धार्मिक पर्व माना जाता है।जिसका अनुसरण करना हम सब भारतीयों का परम कर्तव्य है।जबकि हम और हमारा समाज धीरे धीरे अपनी संस्कृति सभ्यता और संस्कारों को भूलते जा रहे हैं जो हम सबके लिये चिंता का विषय है। हमारा आज का युवा वर्ग भी लगभग दीवाली मनाने के पुरातन ढंगों से अनजान सा या कहा जा सकता है कि दूर होता जा रहा है।जिसके लिये हम सब भी उत्तरदायी हैं। क्योंकि आधुनिकता की दौड़ या यह कहना बेहतर होगा कि -आगे दौड़ पीछे चौड़ - जैसी स्थिति में आ गए हैं आज हम सभी यह सही है कि वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने से ही देश उन्नति और विकास की मंजिल तय कर पाएगा।

लेकिन यहां यह भी हम सबको याद रखना होगा कि अपनी संस्कृति सभ्यता और संस्कारों के बिना भी हम सब अधूरे तो हैं ही बल्कि रहेंगे भी दीपावलि के दिन ही श्री राम का अयौध्या वापिस आना और घी के दिये जलाने की परंपरा को भला कौन भूल सकता है।लेकिन साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि मर्यादा पुरुषौत्तम श्री राम ने अपने माता पिता के आदेशों को भी सर्वोपरि मानते हुए ही 14 वर्षों तक जंगलों में रहकर और वनवास काटते हुए ही अपनी मान और मर्यादा के साथ - रघुरुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन जाई - जैसी लौकौक्ति पर खूब खरा उतरकर अपने वचनों का  निर्वहन किया था। 

आज के दिन हम सबको बहुत नहीं तो कम से कम अपनी मर्यादाओं में रहकर ही पटाखे बगैरह जलाने के साथ ही अपने आजू बाजू में बीमार पड़े किसी बूढ़े या पड़ोसी का भी ख्याल रखने की जरूरत रहती है।यही नहीं बल्कि किसी गरीब और मजबूर या भूखे असहाय व्यक्ति को भी उपहार स्वरूप मिठाई और भोजन आदि अवश्य ही करवाना चाहिये ताकि हम सब एक दूसरे के हमेशा काम आ सकें। 

 

क्योंकि मेरा ही नहीं बल्कि हम सबका मानना है कि सिर्फ दीवाली के दिन फुलझड़ियां पटाखे जला भर लेने और आपसी रिश्तेदारों में मिठाईयां बांट लेने से ही श्री राम का राम राज्य नहीं बन सकता है। मेरा भारत वास्तव में तो जब तक हम हर इंसान को इंसान की नजर से नहीं देखते हम कभी नहीं कह सकते हैं - दीवाली मुबारक हो या दीपावलि की हार्दिक शुभ कामनाएं। 

राजेन्द्र पालमपुरी सेवानिवृत शिक्षा अधिकारी स्टेट एवार्डी पोस्ट बॉक्स नंबर - 45 -  मनाली जिला कुल्लू हि० प्र० 

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