विश्व डाक दिवस विशेष:कबूतरों से लेकर टेलीग्राम तक का सफर ..........

विश्व डाक दिवस विशेष:कबूतरों से लेकर टेलीग्राम तक का सफर ..........

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 09 Oct, 2019 12:12 pm प्रादेशिक समाचार लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा


हिमाचल जनादेश,राजेन्द्र पालमपुरी

 

कबूतर जा जा जा ...कबूतर जा जा जा - हम  करोड़ों भारतीयों ने यह गीत अक्सर सुना है | और हम सब यह जानते भी हैं कि सदियों से हम एक दूसरे को चिट्ठियां पहुंचाने का काम इंसानों से तो लेते ही रहे हैं बल्कि इस काम को करने के लिये हमने पक्षियों का भी बखूबी इस्तेमाल किया है | और फिर बहुत देर बाद कहीं डाक प्रणाली आरंभ हुई |

अब यहां यह बताना आवश्यक हो जाता है कि हमारी डाक सेवा के लिये 9 अक्तूबर सन् 1874 को यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के गठन हेतु स्विटजरलैंड के बर्न में 22 देशों ने एक संधी पर दस्तखत किये इसी कारण विश्व डाक दिवस मनाने को 9 अक्तूबर का दिन चुना गया | 1 जुलाई सन् 1876 को भारत , यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बना तथा प्रथम बार भारत में 1766 में डाक व्यवस्था का आगाज हुआ |

150 वर्षों से भी अधिक इस संस्था में डेढ़ लाख से भी अधिक पोस्ट ऑफिस हैं जिनमें  89 . 87 % ग्रामीण क्षेत्रों में ही हैं जबकि यह विभाग 21 . 23 वर्ग किलोमीटर में लगभग 8086 की जनसंख्या को अपनी सेवाएं प्रदान करता है | हमारे भारत में इसकी स्थापना एक  विभाग के तौर पर 1 अक्तूवर सन् 1854 को हुई |


कुछ विशेष बातें यह भी हैं कि देश में चिट्ठी पर लगाए जाने वाले डाक टिकिट की शुरुआत वर्ष 1852 में हुई थी | 1 अक्तूबर 1854 को समूचे राष्ट्र में महारानी विक्टोरिया के चित्र वाले डाक टिकिट जारी किये गए थे |

भारतीय डाक सेवा विभाग ने अब तक का सबसे बड़ा टिकिट पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर 20 अगस्त 1991 को जारी किया था | एक बहुत विशेष बात यह भी कि हमारे भारतीय डाक विभाग ने महकती खुश्बू से सुगंधित डाक टिकिट 13 दिसंबर 2006 को चंदन की महक के ,  7 फरबरी 2007 को गुलाब और 26 अप्रैल 2008 को जूही की खुश्बू वाले सुगंधित डाक टिकिट जारी करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है |


जबकि हमारे भारत में पिन कोड की शुरुआत 15 अगस्त सन् 1972 को हुई | बताता चलूं कि हमारे भारत में पिन कोड कुल 6 अंकों पर आधारित हैं | हां पोस्ट बॉक्स रखने की व्यवस्था हमारे यहां ब्रिटिश काल से ही आरंभ हो चुकी थी जो अब तक भी निरंतर जारी है |

भारतीय डाक सेवा का प्रमुख कार्यालय देश की राजधानी दिल्ली में है | देश का प्रथम डाकघर 1774 में वॉरेन हैंस्टिग्स ने कलकत्ता में स्थापित किया था | और हां हमारी डाक व्यवस्था ने 1 अक्तूबर 2004 को अपने इस सफर के 150 वर्ष पूरे कर लिये हैं |


हम सब जानते हैं कि डाक विभाग ने हमारी सहूलियत यानि हमारे संदेश पहुंचाने के लिये कई कारगर कदम उठाए हैं , जिनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है | समय समय पर चिट्ठी , पार्सल , मनिऑर्डर , रजिस्ट्री , स्पीड पोस्ट और तार यानि टैलिग्राम जैसी विशेष सुविधाएं दी हैं डाक विभाग ने हम सबको |


जब डाक व्यवस्था नहीं थी तो हममें से बहुत से लोग नहीं जानते होंगे कि ढोल नगाड़ों के जरिये भी हम अपने संदेश सामूहिक तौर पर पहुंचाया करते थे | बल्कि राजा महाराजा तो अपनी प्रजा तक अपने संदेशों को विशेष संवाहकों द्वारा मुनादी करवा कर दिया करते थे | कहीं कहीं तो यह रिवायत अभी तक भी संजोए रखे हैं लोग |

मुझे बहुत अच्छे से याद है पालमपुर का खजाना राम जो अपने ढोल बजाने के लिये और महारत हासिल किये हुए मशहूर था | पालमपुर के लक्ष्मी थियेटर ( सिनेमा हॉल ) के लिये वहां लगने वाली फिल्मों के लिये मुनादी किया करता था , यह कहते हुए कि - सुनिये जनाव-ए-आला क्या कहता है मुनादी वाला , मुनादी सुनना गौर से फिर बात करना किसी और से - बगैरह बगैरह |

खैर आधुनिकता के चलते  हमने चिट्ठी लिखना तो बहुत पहले से ही छोड़ दिया था किंतु दुर्भाग्यवश डाक विभाग ने 15 जुलाई 2013 को तार यानि टैलिग्राम को भी अलविदा कह दिया | 

जरा याद करें चिट्ठी का इंतजार हममे से किसने नहीं किया है | कितनी उत्सुकता और आत्मीयता भरी रहती थी चिट्ठी में | डाक बाबू की प्रतीक्षा हम सभी को रहती थी | लेकिन अब न बह चिट्ठी ही रही और न ही वे उत्सुकताएं ही |  मैं समझता हूं , हमारी संवेदनाओं में जो अंतर आ रहे हैं इन सबका कारण भी शायद ऐसी ही घटती या खत्म होती रस्में या रिवायतें भी रही हैं जिनके न होने से हम सब संवेदनहीन हो रहे हैं |

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मेरा अनुभव है जब हमारी संवेदना खत्म होती   हैं तो वहीं से इंसानियत या आदमीयत की भी सांसें थमने लगती हैं | अत: भले ही सरकारी विभाग द्वारा मजबूरियों के या फिर आधुनिकता के चलते कुछ डाक सुविधाएं बंद करनी पड़ रही हों लेकन हमें अपनी संवेदनाओं को सदैव मानवता के हित में बनाए रखना होगा | ताकि हम सब इंसानियत को जिंदा रख सकें , इसकी मिसाल बन सकें |


राजेन्द्र पालमपुरी सेवानिवृत शिक्षा अधिकारी ( स्टेट एवार्डी ) पोस्ट बॉक्स नंबर - 45 -    मनाली जिला कुल्लू - हि०प्र० 

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