धर्मशाला उपचुनाव विश्लेषण :अंतर्द्वंद के चलते धर्मशाला सीट से कहीं हाथ न धो बैठे भाजपा

धर्मशाला उपचुनाव विश्लेषण :अंतर्द्वंद के चलते धर्मशाला सीट से कहीं हाथ न धो बैठे भाजपा

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 22 Sep, 2019 11:28 am प्रादेशिक समाचार राजनीतिक-हलचल सुनो सरकार सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा शिक्षा व करियर

हिमाचल जनादेश ,मोनू राष्ट्रवादी 

धर्मशाला उप चुनाव में कांग्रेस के पास खोने के लिए  कुछ भी नहीं है जबकि भाजपा की साख इस चुनाव में दाव पर लगी हुई है।  एक तरफ जहाँ "पत्र बम" ने भाजपा की नींद उड़ा रखी है तो वहीँ रोज बढ़ रही भाजपा दावेदारों की सूची भी उनके गले की फांस गयी है।  

उपचुनावों की तारीख तय होने के साथ ही धर्मशाला उपचुनाव को लेकर भाजपा में चल रही माथापच्ची काफी बढ़ गयी है और हो भी क्यों न क्योंकि धर्मशाला प्रदेश की दूसरी राजधानी है ।धर्मशाला का नेतृत्व करने वाला प्रतिनिधि पूरे जिला कांगड़ा सहित चम्बा की राजनीति को प्रभावित करता है क्योंकि जिला कांगड़ा की 15 सीटें और जिला चंबा की 5 सीटों का भविष्य धर्मशाला पर केंद्रित होता है।


 आपको बताते चलें हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में नागरिक उपभोक्ता मंत्री किशन कपूर के चंबा-कांगड़ा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने के कारण यह सीट खाली हुई थी जिस कारण अब इस सीट पर उपचुनाव होंगे ।

एक ओर जहां भाजपा को इस सीट पर एक गद्दी समुदाय से संबंधित चेहरे की तलाश है तो वहीं दूसरी ओर भाजपा एक ऐसी चेहरे की भी जरूरत है जो धर्मशाला की सभी वर्गों के बीच में सामंजस्य बिठाने की क्षमता रखता हो।

 

धर्मशाला में वर्तमान में करीब 80 हजार  मतदाता हैं जिनमें से एक तिहाई भाग गद्दी समुदाय से संबंधित है तो इससे कुछ अधिक अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता हैं बाकी बचे मतदाता सामान्य वर्ग से संबंध रखते हैं । यहां ये बताना भी जरूरी  है  कि इन सब वर्गों में करीब 30% लोग वे हैं जो अपनी नौकरी पेशे व व्यापार के चलते धर्मशाला के स्थाई निवासी हो गए हैं । यह एक ऐसा वर्ग है जो जातीय समीकरणों से परे सोचता है और धर्मशाला की उस स्मार्ट सिटी और अन्य मूलभूत सुविधाओं की आस लिए बैठा है।

 

 हालांकि हाल ही में सूबे के मुख्यमंत्री के धर्मशाला में हुए दौरे में उन्होंने साफ कहा है कि धर्मशाला से जमीन से जुड़ा व्यक्ति पार्टी का चेहरा होगा लेकिन जमीन से जुड़े व्यक्तियों में फिलहाल पार्टी ऐसा चेहरा ढूंढ पाने में नाकाम है जो धर्मशाला की कमान संभालने का दम रखता हूं।


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सूत्रों की मानें तो किशन कपूर इस सीट से अपने वारिस के रूप में अपने पुत्र को उतारना चाहते थे।  लेकिन पार्टी और संगठन में उन पर सहमति न बन पाई।  सुना है इसी कारण वह पार्टी व संगठन से अंदरखाते नाराज चल रहे हैं।  उधर दूसरी ओर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार की ओर से डॉ राजीव भारद्वाज के नाम को लेकर सहमति बनाए जाने की चर्चाओं का बाजार भी खूब गर्म है।

गौरतलब है कि हालिया लोकसभा चुनाव के दौरान शांता कुमार ने सक्रिय राजनीति से सन्यास की घोषणा कर दी थी। लेकिन धर्मशाला सीट के लिए कुछ दिन पहले हमीरपुर जिला से एक दिग्गज नेता का नाम की चर्चा निकलने पर विचारों की लहरियां कुछ इस कदर हिलोरे खाने लगी  कि सूबे के मुख्यमंत्री को शंका मिटाने के लिए राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शांता कुमार की चौखट याद आ गई। 

 

शांता कुमार के विषय में यह खूब चर्चित है कि वह जिस बात पर अड़ जाते हैं, उस बात को  मनवा कर ही दम लेते हैं। धर्मशाला को लेकर इस बार उनका प्यार डॉ राजीव भारद्वाज पर उमड़ आया है। 
 

लेकिन धर्मशाला के मिजाज की बात की जाए तो डॉ राजीव भारद्वाज के  राजनीतिक समीकरण इस सीट पर फिट नही बैठ रहे।   धर्मशाला के वोटरों की नब्ज के मुताबिक उन्हें ऐसे उम्मीदवार की तलाश है जो गद्दी समुदाय से संबंध तो रखता है हो साथ ही राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार भी न हो।  अगर ऐसा न हुआ तो आजाद उम्मीदवारों की संख्या बढ़ जाएगी। आजाद उम्मीदवारों में अधिकतर सत्तासीन भाजपा से ही हो सकते हैं जो भाजपा के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

ऐसे में भाजपा के अंतर्द्वंद के चलते धर्मशाला से भाजपा की छुट्टी होना निश्चित होगा कहना अतिश्योक्ति न होगा। आचार सहिंता लगने के बाद भाजपा उम्मीदवारों के चयन को लेकर क्या पैमाना अपनाती है ,कायकर्ताओं की सोच पर ,फील्ड रिपोर्ट पर क्या निर्णय लेती है, देखना दिलचस्प होगा.......

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