सम्पादकीय:शिक्षक दिवस विशेष - पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन् के जन्मोत्सव पर ही मनाया जाता है

सम्पादकीय:शिक्षक दिवस विशेष - पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन् के जन्मोत्सव पर ही मनाया जाता है

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 05 Sep, 2019 02:22 pm प्रादेशिक समाचार सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा मनोरंजन शिक्षा व करियर आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश ,राजेन्द्र पालमपुरी 

शिक्षक दिवस विशेष - पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ० राधाकृष्णन् के जन्मोत्सव पर ही मनाया जाता है - शिक्षक दिवस और हम सभी जानते हैं।यह दिन हर वर्ष 5 सितम्बर को मनाते हैं हम सब शिक्षक दिवस को मनाए जाने के पीछे हमारा मन्तव्य यही रहता है। कि हम अपने गुरुजनों का सम्मान करें उन्हें सम्मानित करें समूचे भारतवर्ष में आज के दिन हमारी पाठशालाओं के शिष्य अपने गुरुजनों को अपनी श्रद्धानुसार उपहार देना उन्हें फूल समर्पित करना अपना सौभाग्य समझते हैं और ऐसा हो भी क्यों न हमारे गुरुजनों,हमारे अभिभावकों से हम सबको यही संस्कार तो मिले हैं। जिन्हें हम संजोए रखने के लिये हमेशा प्रयासरत रहते तो हैं ही बल्कि जनमों तक रहेंगे भी क्योंकि यही हमारी संस्कृति व सभ्यता है और परंपरा भी गुरु - शिष्य के रिश्तों को प्रगाढ़ और मजबूत करना भी तो शिक्षा का ही एक स्तंभ है।

जिसे यदि हम सब निभाएं तो गुरु शिष्य के रिश्ते गुरु द्रोण और एकलब्य को कभी न भूल पाएंगे।आज के दिन देश के प्रत्येक राज्य में आदर्श गुरुओं को राज्य सरकारों द्वारा राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित करने की प्रथा है। कहना होगा कि आज के दिन समस्त भारत अपने सर्वश्रेष्ठ गुरुजनों का आदर सत्कार और सम्मान करता है।हमारे प्रदेश में भी यही परंपरा बरसो से निभाई जा रही है और  प्रदेश सरकार हर वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ठ कार्य करते शिक्षकों को राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कार देकर पुरस्कृत करती है जो गौरवमयी है। हम सबके लिये हर वर्ष यहां विभिन्न शिक्षक श्रेणियों के मद्देनजर ही पुरस्कार दिये जाते हैं। जिनमें कम से कम 16 पुरस्कारों की संख्या तो रहती ही है। किंतु इस साल केवल 16 में से कुल 12 शिक्षकों को ही राज्य पुरस्कार से सम्मानित करने में कुछ अटकलों का बाजार गर्म है बल्कि इन पुरस्कारों में भी किसी एक शिक्षक को राज्य स्तरीय पुरस्कार देने पर शिक्षकों द्वारा ही विरोध जताया जा रहा है।

जबकि सरकार का कहना है कि अनेकों शिक्षक बह मानदंड ही पूरा नहीं कर पाए जिनसे बह पुरस्कार प्राप्त कर पाते यहां यह कहना भी सही होगा कि हर वर्ष प्रदेश का हर जिला यह पुरस्कार पाने में सफल नहीं रहता जबकि ऐसा होना दुखदायी है। इतिहास या शास्त्रों की ही बात पर गुरुजनों का अपने शिष्यों के प्रति स्नेह और उदारता के अनेकों उदाहरण देखने सुनने और पढ़ने को तो मिलते ही हैं बल्कि शिष्यों के द्वारा गुरुओं के दिये आदेश पालन उनकी दी गई शिक्षाओं पर खरा उतरने के किस्से भी कुछ कम नहीं हैं।

जिनमें गुरु द्रौणाचार्य के एकलब्य , आरुणी , गुरु नानक के अनुयायी बाला और मरदाना  आदि को रहती दुनियां तक याद रखा जाएगा।एकलब्य को जहां  गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा ही गुरु द्रौणाचार्य को काट कर दिये जाने की बात को हमेशा स्मरण किया जाता रहेगा। वहीं शिष्य आरुणी को गुरु द्वारा दिये गए आदेश पर खेत की मेंढ़ से निकलते पानी को सारी रात रोकने की कौशिश में लगे रहना ही गुरु शिक्षा पर चलते रहने की प्रेरणा देती अनुपम सीख है आज के शिष्यों के लियेगुरुजनों के प्रति हमें सदैव ऋणी रहना चाहिये क्योंकि अध्यापक ही एक ऐसा दीपक है। जो हम सबको जीवन के अंधियारे रास्तों में अपनी दी हुई शिक्षा से उजालों की लौ दिखलाता है सदैव और दिखाता रहेगा। 

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मैं अपनी ही बात करूं तो आज भी अपने शिक्षकों में मैं परस राम आचार्य , राजेन्द्र डोगरा , शिक्षिका आदर्श लता रल्हन ,त्रिलोक कश्यप और विजेन्द्र शर्मा शिक्षकों को भूल नहीं पाता हूं जिनके अनुकरणीय व्यवहार और उदार ह्रदय से ही अनेकों शिष्य जिंदगी के अनुपम मुकाम पर पहुंचे हैं।पालमपुर जिला कांगड़ा के राजकीय को० ऐजूकेशनल हाई स्कूल घुग्गर ( उस समय ) का भी मैं सदैव ऋणी रहूंगा जहां अनेकों सुविधाएं न होते हुए भी हमने अपनी शिक्षा का पहला कदम जीवन की अगली सीढ़ियां पार करने के लिये रखा था। आज के संदर्भ में शिष्य और अभिभावक अपने ही स्कूलों की बहुत सी कमियां निकालते देखे जाते हैं जबकि वास्तव में देखा जाए तो गुरु को शिष्य और शिष्य को गुरु से ही केवल नाता रखना चाहिये तभी सफलताएं मिलती हैं।

सुख सुविधाएं तो मात्र एक बहाना होती हैं शिक्षा प्राप्त करने के लिये मैं यहां यह बात भी स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि शिक्षा तो किसी भी पाठशाला में ग्रहण की जा सकती है भले ही बह पाठशाला निजि हो या फिर सरकारी लेकिन गुरु और शिष्य न तो निजि ही हुए हैं और न सरकारी ही गुरुजनों को सम्मान देने की ही बात पर मुझे पुरस्कार प्राप्त कर चुके बहुत से शिक्षक याद आते हैं। जिनमें 1970/80 के दशक  में जिला कांगड़ा के गौतम व्यथित को भी राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

उसके बाद के वर्षों में कुल्लू जिला के जनाव अवस्थी जी बलदेव बौद्ध को राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है जबकि एक लंबे अंतराल के बाद जिला कांगड़ा से संबंध रखते लेकिन जिला कुल्लू में कार्यरत शिक्षक राजेन्द्र पालमपुरी को भी राज्यपाल हिमाचल प्रदेश द्वारा राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है वर्ष 2011 में लेकिन दुखद है कि इस वर्ष प्रदेश के कई जिला ऐसे पुरस्कारों से वंचित रहे हैं। 

यहां यह कहना भी आवश्यक हो जाता है कि प्रदेश के शिक्षक भले ही इन पुरस्कारों की होड़ में आगे न निकल पाए हों लेकिन संबंधित शिक्षा विभाग को चाहिये कि शिक्षा जगत से जुड़े ऐसे अध्यापकों की अनदेखी कभी न की जाए जो इन पुरस्कारों के पात्र हों और ऐसा सब कुछ सरकार,संबंधित विभाग और जिला स्तर पर बनाई जाने वाली पुरस्कार कमेटियों  के आपसी तालमेल से ही संभव हो सकता है। 

आज शिक्षा दिवस के अवसर पर मैं उन तमाम शिक्षकों को नमन करता हूं जिन्होंने हमें हम सबको जिंदगी जीने की कला सिखाई ही नहीं बल्कि हमें सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
                                                                              जय शिक्षक - जय भारत 

राजेन्द्र पालमपुरी सेवानिवृत शिक्षा अधिकारी स्टेट अवार्डी पोस्ट बॉक्स नंबर 45 पालमपुर जिला कांगड़ा हि० प्र

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