सम्पादकीय :आखिर दलित समाज का कब तक होता रहेगा शोषण

सम्पादकीय :आखिर दलित समाज का कब तक होता रहेगा शोषण

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 27 Aug, 2019 08:39 pm प्रादेशिक समाचार लाइफस्टाइल सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा स्वस्थ जीवन शिक्षा व करियर आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश, राजेंद्र पालमपुरी 

 आजाद भारत की बात करें तो हंसी आती है | क्योंकि किसी दलित के मूंछें भर रख लेने से उच्च कुल के चंद दकियानूसी लोगों को तकलीफ होती है जो शर्मनाक और अफसोसनाक बात है |

  कहने को तो हम सभी आजाद हो गए हैं लेकिन  दिल और दिमाग से हम अभी भी जातिगत दलदल और छूआछूत के कीचड़ में सतही तौर से फँसे हुए हैं , जिससे शायद ही कभी निकल पाएँगे हम सब ! गत वर्ष ही में प्रदेश के ज़िला कुल्लू में हुए और विशेष यह कि पाठशाला में पढ़ते बच्चों के साथ हुए जातिगत दुर्व्यवहार के चलते सिर तो शर्म से झुकता ही है , हमारे अन्दर का इन्सान भी मर गया नज़र आता है !

दैनिक समाचारों  में साधारण काग़ज़ के पृष्ठ पर पाठशाला के दलित बच्चों ने प्रशासन के नाम जो पत्र लिखा था बह दिल में तूफ़ान लाती गुज़ारिश है ! जिसपर सम्बन्धित प्रशासन ने पाठशाला प्रबन्धन पर कड़ा संज्ञान लेते हुए त्वरित कार्यवाही कर दलित समाज को किसी हद तक थोड़ी राहत दी थी |

लेक़िन आख़िर कब तक और ऐसा क्यों होता रहेगा यह सवाल हमेशा जस का तस है ! इसमें ज़िला कुल्लू ही नहीं , प्रदेश के बाकी ज़िलों सिरमोर और किन्नौर से भी अक्सर ऐसे ही समाचार दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहे हैं पिछले बरस !

ज़िला काँगड़ा के पालमपुर में  कहीं किसी दलित को मन्दिर के अन्दर जाने नहीं दिया जाता है तो किन्नौर में कहीं पंचायत का फ़रमान जारी किया जाता रहा  है  मन्दिर में प्रवेश न करने के लिये दलितों को ! और कहीं कहीं तो दलित परिवारों को पानी देना ही बन्द कर दिया जाना , मानवता का मज़ाक उड़ाती बात है !

देश के भी अन्य प्रदेशों में किसी दलित को ज़िन्दा जला दिया गया तो किसी परिवार को सरे आम नँगा कर दिया गया ! कहीं कहीं तो उच्च या निम्न कुल में प्यार मुहब्बत करते दलित और ऊँचे परिवारों के लड़के लड़कियों को दरिन्दगी से मार काट दिया गया ! प्रशासन की ओर से कुछ दिन कार्यवाही के बाद मामलों का ठप्प होना कोई नई बात नहीं है !

अक्सर पाठशालाओं में मध्यान्ह भोजन यानि मिड डे मील परोसे जाने को लेकर भी अनेकों बार बहुत से किस्से सामने आए हैं ! लेक़िन क्योंकि दलित समाज ने भी वहीं अपना जीवन निर्वाह करना होता है तो भविष्य में ऐसा कुछ न होगा जैसे समझौते कर आपस में ही यह मामले सुलझा लिये जाते रहे हैं !

कहा जा सकता है कि समाज में रहते हुए ऐसी मजबूरियाँ हर इन्सान की रहती ही हैं ! और फ़िर उसपर समाज के ठेकेदार अपनी धन सम्पन्नता के चलते भी समाज में पिछड़े और ग़रीब तबके या वर्ग पर , कुछ रुपयों के ज़ोर और डराए धमकाए जाने पर ऐसी वारदातों को सिरे से ही खारिज करवाने  में कामयाब भी रहते हैं जो कि आम देखा जा सकता है !

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यहाँ यह कहना तो न्यायौचित लगता ही है कि पाठशालाओं में यह सब क्यों होता है ! कमाल और आश्चर्य की बात तो यह भी है कि शिक्षकों की नाक तले यह सब दलित बच्चों के साथ होता है और शिक्षक या तो  खामौशी से यह तमाशा देखते रहते हैं या फ़िर कहना होगा कि ग्रामीण परिवेश में बह स्वंय इस पर अँकुश लगाने में सफ़ल नहीं रहते क्योंकि बह भी तो उसी समाज का एक हिस्सा हैं जहाँ से छूआछूत और वर्ग भिन्नताएँ पनपती हैं !

 

हाँ इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि शिक्षक वर्ग में भी यदि सभी वर्ग के शिक्षक हैं तो फ़िर दलित वर्ग के शिक्षक पाठशालाओं में ऐसा सब होने ही क्यों देते हैं ! लेक़िन बात फ़िर वहीं अटक जाती है कि यह सभी अध्यापक स्थानीय परिवेश से जुड़े होते हुए ऐसे मामलों में अपनी आँखें बन्द करके और बस चुप्पी साधे रहते हैं जो कि पाठशालाओं में शिक्षा ग्रहण करते सभी बच्चों के साथ अन्याय है !

ऐसे बच्चों की शिक्षा या उनके बचपन में क्या निखार ला पाएँगे हम सब , जिनके बालमन में बचपन से ही सामाजिक विसंगतियाँ और अनेकों प्रश्न ज़िन्दग़ी भर उनसे स्वंय सवाल करते रहेंगे ! प्रदेश की बहुतेरी पाठशालाओं में दोपहर के भोजन परोसे जाने के वक्त दलित समाज के बच्चे खुद व खुद अलग से पंक्तियाँ बनाकर बैठ जाते हैं क्योंकि उनके मन में अपने घरों से ही और प्रतिदिन उनसे होते दुर्व्यवहार जैसे यही संस्कार डाल जिये जाते हैं जबकि पाखण्डी समाज के यह जबरन थौंपे गए संस्कार  हमारे मरने तक हमारे साथ ही रहते हैं और जिनके दुष्परिणाम हमारे बच्चों में ही नहीं बल्कि हमारे समाज में अक्सर देखने को मिलते हैं और शायद हम सब देखते रहेंगे !

सोशयल मीडिया पर तो सरे आम तुलनात्मक शब्दों के तीर प्राय: दलित समाज पर छोड़े जाने की जैसे परंपरा सी हो गई है | मैं समझता हूँ ऐसे संवादों पर और सोशयल मीडिया पर शीघ्र रोक लगाए जाने की भी जरूरत है |


यहाँ यह कहना भी आवश्यक हो जाता है कि दलित हित की बात करते हिन्दु समाज में सियासी और ग़ैर राजनैतिक स्वैच्छिक संस्थाएँ ही जब दलित हिन्दुओं की ऐसी दुर्दशा नहीं सँवार पाएँगीं तो फ़िर यह कैसी स्वतन्त्रता है जहाँ हम सब धर्मों और जातियों के लोग इकट्ठे बैठ कर भोजन तो कर ही नहीं सकते बल्कि मन्दिरों में जाने की भी मनाही होती है एक विशेष वर्ग के लोगों के लिये ! मैं समझता हूँ यह इन्सानियत की ज़िन्दा मौत है !


यह कहना भी सही नहीं होगा कि सारा समाज ही ऐसी कुरीतियों का जन्मदाता है ! पुरातन समय में भी सभी लोग जातिप्रथा के समर्थक नहीं रहे हैं जबकि अब भी समाज में रहते जागरूक लोग इसका वाहिष्कार करने में लगे हुए हैं !

प्रदेश के ज़िला कुल्लू की ही बात करें तो यहाँ स्कूलों में कई शिक्षकों द्वारा इन दकियानूसी जंजीरों को जड़ से तोड़ने के प्रयास निरंतर किये जा रहे हैं जिनमें कुल्लू प्राथमिक शिक्षा खण्ड दो , लगघाटी के प्राथमिक शिक्षक देवेन्द्र ठाकुर , आनी खण्ड च्वाई के संजीव सूद के साथ ही और भी कुछ शिक्षकों ने ऐसी प्रथाओं को तोड़ कर नन्हें मुन्नों के जीवन में बदलाव लाने की कौशिश की है जिसकी जितनी सराहना की जाए कम है !


पाठशालाओं में शिक्षागत ढाँचे को लेकर और नई दिशा देने के नित किये जा रहे प्रयासों का यहाँ कोई औचित्य नहीं रहता जब प्रदेश के नौनिहालों को सितम्बर 2004 से दिये जा रहे मिड डे मील का उद्देश्य तो यह भी रहा है कि बच्चों को परोसे जाने वाला दिन का भोजन इन्हें मानसिक पौष्टिकता के साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य में भी बृद्धि करे जबकि दिन प्रतिदिन हो रही ऐसी घटनाओं से सब विपरीत हो रहा है !


प्रदेश में निरन्तर हो रही ऐसी शर्मसार करती घटनाओं से भले ही हम सब अपनी सफाईयाँ देते हुए बच निकलते हैं लेक़िन स्पष्ट कहूँगा - उसके घर में देर है , अन्धेर नहीं ! अत: सरकार और प्रशासन को ऐसे बेहूदा किस्सों को रोकने के लिये सख़्त कदम उठाए जाने की आवश्यक्ता तो है ही बल्कि कड़ी से कड़ी सज़ा देना भी ज़रूरी होगा ! जिससे लोग ऐसा करते हुए एक नहीं बल्कि कई बार सोचें !

अन्यथा कहना ग़लत नहीं होगा कि विकास और उन्नति की बात तो छोड़ें जहाँ हम दिमागी तौर पर तो पहले से ही ग़ुलाम हैं कहीं अपने देश को  फ़िर से ग़ुलाम न बना डालें ऐसे दकियानूसी और रूढ़िवादी  विचारों के चलते हम सब  !
 

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