बूथ कैप्चरिंग के जनक थे नेहरू, आखिर EVM से कांग्रेस को ऐतराज क्यों? पढ़ें पूरी खबर...

बूथ कैप्चरिंग के जनक थे नेहरू, आखिर EVM से कांग्रेस को ऐतराज क्यों? पढ़ें पूरी खबर...

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 22 May, 2019 11:40 pm राजनीतिक-हलचल क्राईम/दुर्घटना देश और दुनिया सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर

हिमाचल जनादेश

कल सुबह लोकसभा के चुनाव के नतीजे घोषित होने हैं, सभी एग्जिट पोल में  भाजपा की सरकार बनने के दावे किए जा रहे हैं लेकिन कांग्रेस  ईवीएम मशीन के हैक होने  और  ईवीएम मशीनों के बदलने  को लेकर  चुनाव आयोग को संदेह के  कटघरे में खड़ा कर रही है  ।आखिर  ईवीएम को लेकर  कांग्रेस और विपक्षी दलों को इतना  डर क्यों है , आइए भारत में वोटिंग के इतिहास जानने का प्रयत्न करते हैं।

जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से पराजित घोषित हो चुके कांग्रेसी प्रत्याशी मौलाना अबुल कलाम आजाद को किसी भी कीमत पर जबरदस्ती जिताने के आदेश दिये थे। उनके आदेश पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री पं. गोविन्द वल्लभ पन्त ने रामपुर के जिलाधिकारी पर घोषित हो चुके परिणाम बदलने का दबाव डाला और इस दबाव के कारण प्रशासन ने जीते हुए प्रत्याशी विशनचन्द्र सेठ की मतपेटी के वोट मौलाना अबुल कलाम की पेटी में डलवा कर दुबारा मतगणना करवायी और मौलाना अबुल कलाम को जिता दिया।

यह रहस्योदघाटन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सूचना निदेशक शम्भूनाथ टण्डन ने अपने एक लेख में किया था। उन्होंने अपने लेख ‘जब विशनचन्द सेठ ने मौलाना आजाद को धूल चटाई थी भारतीय इतिहास की एक अनजान घटना’ में लिखा है कि भारत में नेहरू ही बूथ कैप्चरिंग के पहले मास्टर माइंड थे।

देश के प्रथम आम चुनाव(1952) में सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस के 12 हारे हुए प्रत्याशियों को जिताया गया। देश के बटवारे के बाद लोगों में कांग्रेस और खासकर नेहरू के प्रति बहुत गुस्सा था लेकिन चूँकि नेहरू के हाथ में अन्तरिम सरकार की कमान थी इसलिए नेहरू ने पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके जीत हासिल की थी।

देश के बटवारे के लिए हिन्दू महासभा ने नेहरू और गान्धी की तुष्टीकरण नीति को जिम्मेदार मानते हुए देश में उस समय जबरदस्त आन्दोलन चलाया था और लोगों में नेहरू के प्रति बहुत गुस्सा था इसलिए हिन्दू महासभा ने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के विरुद्ध हिन्दू महासभा के दिग्गज लोगों को खड़ा करने का निश्चय किया था।

नेहरू के विरुद्ध फूलपुर से सन्त प्रभुदत्त ब्रम्हचारी और मौलाना अबुल कलाम के विरुद्ध रामपुर से विशनचन्द्र सेठ को लड़ाया गया। नेहरू को अन्तिम राउण्ड में जबरदस्ती 2000 वोट से जिताया गया। वहीं सेठ विशनचन्द्र के पक्ष में भारी मतदान हुआ और मतगणना के पश्चात् प्रशासन ने बाकायदा लाउडस्पीकरों से सेठ विशनचन्द्र को 10000 वोट से विजयी घोषित कर दिया।

जीत की खुशी में हिन्दू महासभा के लोगों ने विशाल विजय जुलूस भी निकाला। जैसे ही ये समाचार वायरलेस से लखनऊ फिर दिल्ली पहुँची तो मौलाना अबुल कलाम आजाद की अप्रत्याशित हार के समाचार से नेहरू तिलमिला उठे और उन्होंने तमतमा कर तुरन्त उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री पं. गोविन्द वल्लभ पन्त को चेतावनी भरा सन्देश दिया कि मैं मौलाना की हार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता, अगर मौलाना को जबरदस्ती नहीं जिताया गया तो आप अपना इस्तीफा शाम तक दे दीजिए।

फिर पन्तजी ने आनन फानन में सूचना निदेशक (जो इस लेख के लेखक हैं) शम्भूनाथ टण्डन को बुलाया और उन्हें रामपुर के जिलाधिकारी से सम्पर्क करके किसी भी कीमत पर मौलाना अबुल कलाम को जिताने का आदेश दिया। फिर जब शम्भूनाथ जी ने कहा कि सर! इससे दंगे भी भड़क सकते हैं तो इस पर पन्तजी ने कहा कि देश जाये भाड़ में, नेहरू जी का हुक्म है।

फिर रामपुर के जिलाधिकारी को वायरलेस पर मौलाना अबुल कलाम को जिताने के आदेश दे दिये गये। फिर रामपुर का सिटी कोतवाल ने सेठ विशनचन्द्र के पास गया और कहा कि आपको जिलाधिकारी साहब बुला रहे हैं जबकि वो लोगों की बधाइयाँ स्वीकार कर रहे थे। जैसे ही जिलाधिकारी ने उनसे कहा कि मतगणना दुबारा होगी तो विशनचन्द्र सेठ ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि मेरे सभी कार्यकर्ता जुलूस में गये हैं ऐसे में आप मतगणना एजेंट के बिना दुबारा मतगणना कैसे कर सकते हैं?

लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गयी। जिलाधिकारी ने साफ साफ कहा कि सेठ जी! हम अपनी नौकरी बचाने के लिए आपकी बलि ले रहे हैं क्योंकि ये नेहरू का आदेश है। शम्भूनाथ टण्डन जी ने आगे लिखा है कि चूँकि उन दिनों सभी प्रत्याशियों की उनके चुनाव चिन्ह वाली अलग-अलग पेटियाँ हुआ करती थीं और मतपत्र पर बिना कोई निशान लगाये अलग अलग पेटियों में डाले जाते थे।

इसलिए ये बहुत आसान था कि एक प्रत्याशी के वोट दूसरे की पेटी में मिला दिये जायें। 1957 के आम चुनावों में हथियार के साथ हुई थी देश की पहली बूथ कैप्चरिंग पहली लोकसभा ने अपना कार्यकाल पूरा किया और 1957 में देश का दूसरा आम चुनाव हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने एक बार फिर प्रचंड जीत हासिल करते हुए सरकार बनाई।

कांग्रेस ने कुल 494 सीटों में से 371 पर जीत का परचम लहराया। ये चुनाव कई मायनों में विशेष रहे। भारतीय जनता पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार संसद पहुंचे थे। पहली बार इसी साल बूथ कैप्चरिंग की घटना भी घटी। दूसरे आम चुनाव के दौरान ही देश पहली बार बूथ कैप्चरिंग जैसी घटना का गवाह बना।

यह घटना बिहार के बेगूसराय जिले में रचियारी गांव में हुई थी। यहां के कछारी टोला बूथ पर स्थानीय लोगों ने कब्जा कर लिया। इसके बाद तो अगले तमाम चुनावों तक बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं आम हो गईं, खासकर बिहार में, जहां राजनीतिक पार्टियां इसके लिए माफिया तक का सहारा लेने लगीं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने 2005 में अपनी एक ख़बर में एक स्थानीय का बयान छापा था, जिसका कहना था कि यह परंपरा आज भी यहां है, लेकिन इसका नाम बदलकर यहां इसे बूथ कैप्चरिंग की बजाए बूथ मैनेजमेंट कहने लगे हैं।

यहां के पुराने लोग 1957 के आम चुनावों के बारे में बताते हैं कि कैसे स्थानीय लोगों ने रचियारी गांव के कछारी टोला से सरयुग प्रसाद सिंह के पक्ष में बूथ कैप्चरिंग की गई थी. यहां से बड़े कम्युनिस्ट नेता चंद्रशेखर सिंह को पहली बार चुना गया था.बाद में बूथ कैप्चरिंग ने बड़ा रूप ले लिया।

राजनीतिक दल बेगूसराय के डॉन कामदेव सिंह को बूथ कैप्चर करने के लिए इस्तेमाल करने लगे. स्थानीय लोग बताते हैं कि 1972 में मिथिला प्रदेश से आने वाले एक बड़े केंद्रीय नेता ने भी कामदेव सिंह को बूथ कैप्चरिंग के लिए इस्तेमाल किया था. कीर्ति झा ने स्वीकारा था कि वह और उसके पिता के बूथ कैप्चरिंग से ही जीतते थे 2019 लोकसभा चुनाव से पूर्व भारतीय जनता पार्टी के दरभंगा से सांसद कीर्ति झा आजाद कांग्रेस में शामिल हुए।

कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनके संसदीय क्षेत्र दरभंगा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने स्वागत समारोह का आयोजन किया था। इस समारोह में उन्होंने कहा कि पहली बार जब मैं चुनाव लड़ रहा था तब मेरे लिए बूथ कैप्चरिंग की गई थी तथा मेरे पिता और बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आज़ाद के लिए भी कांग्रेस के कार्यकर्ता बूथ कैप्चरिंग करते थे।

EVM की शुरुआत से बूथ कैप्चरिंग पर लगी रोक ⦁ ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल मई, 1982 में केरल के परूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के 50 मतदान केन्द्रों पर हुआ| ⦁ 1983 के बाद इन मशीनों का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया गया कि चुनाव में वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल को वैधानिक रुप दिये जाने के लिए उच्चतम न्यायालय का आदेश जारी हुआ था।

दिसम्बर, 1988 में संसद ने इस कानून में संशोधन किया तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में नई धारा-61ए जोड़ी गई जो आयोग को वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल का अधिकार देती है। संशोधित प्रावधान 15 मार्च 1989 से प्रभावी हुआ। ⦁ नवम्बर, 1998 के बाद से आम चुनाव/उप-चुनावों में प्रत्येक संसदीय तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है।

 भारत 2004 के आम चुनाव में देश के सभी मतदान केन्द्रों पर 10.75 लाख ईवीएम के इस्तेमाल के साथ ई-लोकतंत्र में परिवर्तित हो गया। तब से सभी चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है।

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