देश के पहले शहीद गरुड़ कमांडो हैं गुरसेवक..शादी के एक महीने बाद ही हुए शहीद....

देश के पहले शहीद गरुड़ कमांडो हैं गुरसेवक..शादी के एक महीने बाद ही हुए शहीद....

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 02 May, 2019 12:11 am देश और दुनिया सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर

हिमाचल जनादेश ,अंबाला (डेस्क )

 

देश के पहले शहीद गरुड़ कमांडो गुरसेवक सिंह 2 जनवरी 2016 को शहीद हुए थे गुरसेवक वायुसेना में जून 2010 में ही भर्ती हुए थे। गुरसेवक पठानकोट एयरबेस में हुए आतंकी हमले के दौरान शहीद हुए और उन्हें 5 गोलियां लगी मगर गुरसेवक जब तक निचे नही गिर गये उन्होंने अपनी राईफल नहीं छोड़ी। आज भी गुरसेवक का परिवार उन्हें नही भूल पाता। पिता कहते हैं कि हर किसी का बेटा गुरसेवक जैसा हो उन्हें गुरसेवक की शहादत पर बहुत गर्व है।

हरियाणा के अंबाला का बहादुर बेटा गुरसेवक सिंह भले ही आतंकियों का सामना करते हुए शहीद हो गया हो , लेकिन उसकी शहादत सभी को देशभक्ति का वो जज़्बा दे गई जिसे देख और सुन हर कोई शहीद गुरसेवक और उसके परिजनों को दिल से सलाम करता है। 

अंबाला के छोटे से गांव गरनाला के रहने वाले गुरसेवक ने गांव के ही सरकारी स्कूल से मेट्रिक की परीक्षा पास की उसके बाद गुरसेवक पढने के लिए शहर चला गया व अपनी ग्रेजुएशन पूरी की गुरसेवक ने हर क्लास अव्वल रहते हुए पास हुए की। गुरसेवक के पिता ने बताया कि गुरसेवक शुरू से ही बहुत ही समझदार था हर किसी से प्यार व इज्जत से पेश आता था। गुरसेवक ने उन्हें कभी किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं दिया।

गुरसेवक शुरू से ही काफी हिम्मत वाला था जब पठानकोट आतंकी हमला हुआ तब भी गुरसेवक ने पैर पीछे नहीं किए और पूरी रात दुश्मनों को खोजता रहा लेकिन पीछे से घात लगाए बैठे आतंकी ने गुरसेवक पर पीछे से 5 फायर कर दिए लेकिन गुरसेवक उससे भी नही घबराया उसने अपनी राईफल नहीं छोड़ी जब शरीर जवाब दे गया तो दूसरे साथी ने पोजीशन ली और गुरसेवक को अस्पताल ले जाया गया लेकिन तब तक काफी खून बह चुका था और देश का पहला गरुड़ कमांडो शहीद हो चुका था।

गुरसेवक के परिवार को गुरसेवक की शाहदत पर बहुत गर्व और फक्र है। परिवार उसकी बहादुरी और जज्बे को कभी नही भूलता। शहीद के पिता सुच्चा सिंह भी फौज में रह चुके हैं और गुरसेवक का बड़ा भाई हरदीप आज भी भारतीय सेना में है। गुरसेवक से परिवार की आखिरी मुलाकात 27 दिसम्बर को हुई थी जब गुरसेवक अगली छुट्टी पर घर आने का वायदा करके गया था। गुरसेवक ने परिवार से आखिरी बात 1 जनवरी को ही थी। जिस दिन गुरसेवक शहीद हुआ उस दिन परिवार उसके घर आने की इंतजार कर रहा था लेकिन गुरसेवक को उसका फर्ज बुला रहा था और उसने जाबांजी से लड़ते हुए दुश्मनों का सामना भी किया।

गुरसेवक के परिवार से सरकार ने जो वायदे किये उन्हें तो लगभग पूरा कर दिया है गुरसेवक के गांव को जाने वाली सडक को शहीद गुरसेवक सिंह मार्ग कर दिया गया है। एक मेमोरियल हाल व उसके स्कूल का नाम भी बदल कर शहीद गुरसेवक सिंह उच्च विघालय कर दिया गया है। गुरसेवक के स्कूल में गुरसेवक की प्रतिमा के साथ स्मारक बनाया गया है जहाँ गुरसेवक की शहादत की गाथा लिखी गयी है। पिता अक्सर गुरसेवक की प्रतिमा को निहारने पहुंच जाते हैं। गुरसेवक के पिता चाहते हैं कि युवा गुरसेवक से प्रेरणा ले व देश के लिए सेना में भर्ती हो।

गुरसेवक के पिता ने बताया गुरसेवक की कोई भी बात वो भूल नही पाते उसने शुरू से ही मन बना रखा था कि सेना में जाकर देश के लिए लड़ेगा वो अक्सर इसकी बाते भी करता रहता था। गुरसेवक के पिता ने बताया जब गुरसेवक छोटा था तो उन्होंने उसे स्कूल में भर्ती करवाया तो टीचर रोज उसे घर वापिस भेज देती जब वो उससे पूछते की घर वापिस क्यूँ आया तो वो कहता मेरा नाम स्कूल में नही लिखवाया है इसलिए उसे टीचर वापिस भेज देती है। 

उन्होंने बताया गुरसेवक पढने में इतना होशियार था कि वो कैदा पढ़ कर सुना दिया करता था तो टीचर उससे पूछती की तुझे पूरी किताब कैसे याद है तो वो कहता मैडम पहली क्लास की किताब की क्या बात, मैं तो दूसरी की भी पूरी किताब सुना दूँ।

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