कलम के चश्में से: निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी पर हंगामा, आखिर कौन कितना जिम्मेदार?

कलम के चश्में से: निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी पर हंगामा, आखिर कौन कितना जिम्मेदार?

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 18 Apr, 2019 04:55 pm प्रादेशिक समाचार सुनो सरकार सम्पादकीय ताज़ा खबर स्लाइडर काँगड़ा शिक्षा व करियर आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश(मोनु राष्ट्रवादी)

प्रदेश में निजी स्कूलों की फीस को लेकर निजी स्कूलों व प्रशासन के बीच तनतनी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । शिक्षा विभाग की ओर से निजी स्कूलों को कम फीस वसूलने के लिए निर्देश जारी हो रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर निजी स्कूल के प्रबंधक बच्चों से वसूली जा रही थी फीस को जायज ठहरा रहे हैं।

ऐसा अक्सर देखा जा रहा है कि जब भी नया शिक्षा सत्र शुरू होता है , शिक्षा विभाग द्वारा निजी स्कूलों द्वारा फीस को लेकर निर्देश जारी कर दिए जाते हैं जबकि बाद में यह सारी बातें ठंडे बस्ते में चली जाती है । ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि शिक्षा विभाग खुद ही निजी स्कूलों की फीस को लेकर असमंजस में है ।

शायद इसकी वजह सरकार में बैठे व प्रशासनिक अधिकारी भी हैं जो शिक्षा को लेकर अब तक कोई ठोस नीति नहीं बना पा रहे। शायद इसमें सरकारों की भी नाकामी रही है जो सरकारी संस्थानों को बेहतर नहीं चला सके ।

संभवत प्रदेश में जिला मुख्यालयों को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा सरकारी स्कूल हो जिसमें अध्यापकों के पद रिक्त न पड़े हो । ऐसे में अभिभावक अपने बच्चों के सुखद भविष्य के लिए निजी संस्थानों की ओर रुख कर रहे इसमें कोई दो राय नहीं। हालांकि अधिकतर निजी शिक्षण संस्थान बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं जिसका प्रमाण बोर्ड की परीक्षा के नतीजे चीख चीख कर देते हैं ।

अब अगर इसका दूसरा पहलू देखें तो निजी स्कूल किसी भी अभिभावक को उनके विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाने के लिए बाध्य नहीं करते बल्कि खुद अभिभावक ही निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना अपना सामाजिक सम्मान समझते है। हालत यह है कि जिन अभिभावकों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं उनको तिरस्कृत नजरों से भी देखा जाने लगा है ।

शायद इसकी एक मुख्य वजह सरकारी स्कूल के अध्यापक भी हैं जो खुद अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। यह विषय सर्वदा चिंतनीय है कि जब खुद सरकारी अध्यापक अपनी ही दी गई शिक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हैं तो फिर अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य उनके हाथों में कैसे सौंप दें?

हालांकि सरकार की ओर से सरकारी कर्मचारियों को उनके बच्चों को सरकारी स्कूल में ही पढ़ाने की भी फरमान कई बार जारी हो चुके हैं लेकिन उन्हें सख्ती से लागू करने में सरकार नाकाम रही है।

ऐसे में अभिभावकों के पास दो ही रास्ते से जाते हैं या तो वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ा कर सरकार की उन व्यवस्थाओं से लड़े या फिर निजी स्कूलों द्वारा उनके बच्चों को दी जाने वाली सुविधा को लेकर वसूली जा रही फीस को भरे क्योंकि निजी विद्यालय शिक्षा के साथ साथ बच्चों की सर्वांगीण विकास के लिए भी बेहतर प्रयासरत हैं ।

ऐसे में सरकार को चाहिए कि या वे सरकारी विद्यालयों में अध्यापकों की रिक्तियों को भरने के लिए प्राथमिकता दें या निजी स्कूल द्वारा ली जाने वाली फीस के लिए कोई ठोस नीति उसे धरातल पर लागू करें। शायद तभी प्रशासन और निजी स्कूलों के बीच में वर्षों से चली आ रही तकरार खत्म हो सके।

Comments

Leave a comment

What's on your mind regarding this news!

Your comment *

No comments yet. Be a first to comment on this.