BPL में हैं तो मनरेगा में दिहाड़ी लगानी ही पड़ेगी अन्यथा कटेगा नाम, सरकार ने जारी किए आदेश

BPL में हैं तो मनरेगा में दिहाड़ी लगानी ही पड़ेगी अन्यथा कटेगा नाम, सरकार ने जारी किए आदेश

संवाददाता (हिमाचल जनादेश) 06 Jan, 2019 08:10 pm सुनो सरकार लाइफस्टाइल ताज़ा खबर स्लाइडर चम्बा शिमला आधी दुनिया

हिमाचल जनादेश, चम्बा(कमल राजपूत)

बीपीएल सूची में बने रहने के लिए परिवार को मनरेगा में दिहाड़ी लगानी ही होगी। ऐसा न करने वाले परिवारों को इस सूची से बाहर का रास्ता देखना होगा। गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले(बीपीएल) परिवारों की सूची में धांधली रोकने के लिए जयराम सरकार ने शर्तों को और भी कड़ा बना दिया है।

अब उसी परिवार का नाम बीपीएल सूची में शामिल होगा, जिस परिवार के कम से कम एक सदस्य ने 20 दिन तक मनरेगा के तहत काम किया हो। सरकार की इस शर्त से ग्रामीण व शहरी इलाकों के साधन-संपन्न लोगों का फर्जी तरीके से बीपीएल सूची में शामिल होना कठिन हो जाएगा। गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में कई प्रभावशाली व साधन-संपन्न लोग गरीबों का हक़ मारकर इस सूची में कुंडली मारकर बैठे हैं।

विभागीय सर्वेक्षणों में भी यह बात खुलकर सामने आई है कि जिन लोगों के पक्के व आलीशान मकान हैं, वे भी इस सूची में शामिल पाए गए हैं। शिकायतों के बाद ऐसे परिवारों पर शिकंजा तो कसा गया था, लेकिन कई लोग आज भी इन सूची में बराबर बने हुए हैं। नतीजतन शिकायतों का सिलसिला आज भी जारी है। ऐसे में सरकार ने शर्तों को और कड़ा करने का फैसला लिया।

अब बीपीएल सूची में सम्मिलित परिवार के एक सदस्य को मनरेगा में कम से कम 20 दिन का काम करना जरूरी किया गया है। कोई परिवार अगर इस नियम की शर्त पूरी नहीं करता है तो ग्राम सभा उस परिवार का नाम नाम बीपीएल सूची से हटा सकती है।

 इसके अतिरिक्त बीपीएल परिवार के एक पात्र सदस्य को दीन दयाल उपाध्याय, ग्रामीण कौशल योजना या फिर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में स्थानीय स्तर पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। इस संदर्भ में सरकारी अधिसूचना जारी हो चुकी है।

जिला पंचायत अधिकारी हरबंस का कहना है कि बीपीएल परिवारों की चयन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए विभाग ने जनवरी 2007 और मार्च 2013 को जारी निर्देशों को संशोधित कर दिया है। इस संशोधन को तुरन्त प्रभाव से लागू माना जाएगा।

 उन्होंने कहा कि गलत जानकारी देने पर नियमों के मुताबिक कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बीपीएल चयन प्रक्रिया के दौरान लोगों को निर्धारित नियमों के बारे में अब पंचायत में शपथपत्र भी देना होगा। इसमें बताना होगा कि परिवार के पास 2 हेक्टेयर से अधिक असिंचित व 1 हेक्टेयर से ज्यादा सिंचित भूमि नहीं है।

साथ ही ये भी जानकारी देनी होगी कि परिवार के पास रहने को पक्का मकान नहीं है और परिवार का कोई सदस्य आयकर दाता भी नहीं है। अन्य शर्तों में परिवार की वेतन, पैंशन, भत्ते, मानदेय, मजदूरी व व्यवसाय से मासिक आय 2500 रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए।

 ये भी दर्शाना होगा कि परिवार का कोई सदस्य सरकारी व गैर सरकारी नौकरी में नियमित या फिर अनुबंध पर कार्य नहीं कर रहा है। अब से पहले बीपीएल सूची में शामिल होने के लिए पंचायत इस तरह का कोई शपथ पत्र नहीं लेती थी।

आखिकार बीपीएल सूची में शामिल  होने  का क्या है प्रलोभन:

 

 

हिमाचल में बीपीएल परिवारों को कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं।इसमें सस्ते राशन सहित मकान बनाने के लिए 1.30 लाख रुपए, विभिन्न सरकारी योजनाओं में अनुदान, नौकरी में आरक्षण, सौ यूनिट मुफ्त बिजली आदि शामिल है। इन सुविधाओं के लालच में ग्राम स्तर पर प्रभावशाली लोग खुद को बीपीएल की सूची में शामिल करवा लेते हैं।

प्रदेश में ग्रामीण विकास व पंचायती राज विभाग सहित अन्य विभाग भी बीपीएल की पात्रता तय करते हैं। प्रदेश में बीपीएल परिवारों का चयन ग्राम सभाओं में करने का प्रावधान है। ग्राम सभाओं में चयन का मकसद साफ है कि इसमें धांधली अथवा भाई भतीजावाद न हो, बावजूद इसके प्रदेश में बीपीएल परिवारों के चयन में धांधली होती रही है।

सरकार के पास कई परिवारों के चयन को लेकर शिकायतें आती रहती हैं। हैरानी की बात है कि हिमाचल में प्रति व्यक्ति आय सालाना 1.52 लाख रुपए हो गई है, लेकिन बीपीएल सूची में नाम दर्ज करवाने वाले कम नहीं हो रहे। हिमाचल में ये भी तय किया गया था कि बीपीएल परिवारों के घरों के आगे उनका नाम व बीपीएल सूची में नंबर आदि का विवरण दर्ज किया जाए।

 कई घरों में ऐसे विवरण लगे, लेकिन पक्के मकान वालों ने उस विवरण को ढंक दिया। शिकायत मिलने पर कार्रवाई भी हुई है। फिलहाल, नई शर्तों से ये फर्जीवाड़ा काफी हद तक रुक सकेगा।

अब एसडीएम भी हैं अपात्र  परिवार  को इस  सूची सेे हटाने में सक्षम:

 प्रदेश सरकार ने जिला उपमंडलाधिकारी(ना०)को भी इस शक्तियां प्रदान की हैं कि वह अपात्र परिवारों के संदर्भ में शिकायत आने पर अपने स्तर पर इसकी जांच कर उन्हें इस सूची से बाहर निकाल सकते हैं।

 सरकार की एसडीएम को इस तरह की शक्तियां देने के पीछे का मकसद समस्त सरकारी योजनाओं का लाभ गरीब परिवारों तक पहुचानें तक से है।

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